Wednesday, March 29, 2017
Thursday, October 6, 2016
नीले आकाश, सुनहरे पहाड़ और सपनों सा हसीन...लद्दाख
हाय...आइ एम अकबर...बेसिकली फ्रॉम लखनऊ...
अच्छा...अकबर दि ग्रेट फ्रॉम लखनऊ...गुड...आप तो मेरे साथ सफर करेंगे। तभी पीछे से आवाज आई...आशीष...अकबर साहब तो कल से पागल ही हुए जा रहे थे कि...मेरे लखनऊ से कौन आ रहा है... कई बार पूछा...एयरपोर्ट पर जब आप नहीं मिले तो सोचा बोर्डिंग में ही मिल लेंगे। लो जी मिल लो...इतना कहते हुए शमिता ने कहा...हॉय आई एम शमिता...शी इज पूर्णिमा एंड शी इज रजनी...और भ्मी बहुत सारे लोग हैं। जो सुबह पांच बजे की फ्लाईट से लेह पहुंच चुके हैं। अब हम सब कुछ दिन लेह में एक साथ गुजारेंगे। सुबह आठ बजकर पचास मिनट पर दिल्ली से उड़े थे। दस बज रहे थे तभी जहाज में अनाउंस हुआ कि लेह एयरपोर्ट पर सेना के जहाजों की उड़ान हो रही है। थोड़ा वक्त लगेगा।
बंजर से भूरे रंग के पहाड़ों की चोटियां। बादलों की ओट में कभी छुप रहीं थी तो कभी सामने आने लगी। तभी फिर अनाउंस हुआ कि अब हम कुछ मिनट में लेह एयरपोर्ट पर लैंड करेंगे। बाहर का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस है। समुद्र तल से साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से लेह में ऑक्सीजन की मात्रा कम है। इसलिए आप लोगों को सलाह दी जाती है कि अपने शरीर को यहां के वातावरण के अनुकूल करने लिए कम से कम 24 घंटे आराम करने दें। पानी और लिक्विड डाइड ज्यादा से ज्यादा लें। हैपपी स्टे इन लद्दाख...इतना सुनते सुनते जहाज लैंड कर चुका था।
यह मेरी लेह की दूसरी विजिट थी। पहली विजिट महज कुछ घंटों की ही थी। जब 2010 में लेह में हुए क्लाउड बर्स्ट के दौरान सीआईआई और सेना ने यहां के गांवों को बसाया था और दिखाने के लिए लाए थे। स्वेटर से लेकर जैकेट तक बाहर आ चुके थे हालांकि पहनने की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन जहाज के कैप्टन के इंस्ट्रक्शन जरूर कानों में सुनाई पड़ रहे थे...अधिक ऊंचाई के चलते सांस लेने में दिक्क्त हो सकती है। लोकल हॉस्पिटल से लेकर सेना के अस्पताल में तक में आप एडवाइस ले सकते हैं आदि आदि।
एयरपोर्ट के बाहर पहुंचते ही सामने दिखते बेइंतहां खूबसूरत शांति स्तूपा की चमक आपको एक अलग दुनिया का अहसास कराती है। सूरज की रोशनी से नहाए हुए भूरे और गोल्डेन कलर के पहाड़ और उनके पीछे एकदम नीले रंग का आसमान मानों लगता हो कोई कैनवास पर उकेरी गई तस्वीर बनी हो। लेह लद्दाख एक ऐसा इलाका है जहां हर वक्त यह महसूस कर सकते हैं कि नीले हो चले आकाश को आप कभी भी छू सकते हो।
नीले आकाश और सुनहरे पहाड़ों में खोया हुआ ही था कि...पीछे से आवाज आई...अबे आशीष...तू अभी भी वैसा है या कुछ बदल गया है...मैंने पीछे मुड़कर देखा तो शायदा जी अपने बैग खींचते हुए और मुझसे यह पूछते हुए आगे बढ़ी चली आ रहीं थी। मैंने भी मुस्कराते हुए उनका इस्तकबाल किया और कहा... कुछ दिन आप साथ रहेंगी...पता ही चल जाएगा बदला हूं या नहीं। शायदा जी को मैं पिछले करीब ग्यारह सालों से जानता हूं। चंडीगढ़ में मैंने उनके साथ काम किया। हालांकि लेह में उनसे मुलाकात तकरीबन छह साल बाद हुई। शायदा जी को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। लेकिन कुछ समय में उनको राहत मिली लेकिन गेस्ट हाऊस पहुंंच कर।
करीब बीस मिनट की दूरी तय करने के बाद हम लोग एक खूबसूरत से एक घर नुमा गेस्ट हाऊस 'मांग्यूल' पहुंच चुके थे। चारों ओर खूबसूरत से पहाड़ों के बीच में बना यह बेइंतहा खूबसूरत गेस्ट हाऊस और उससे भी प्यारा उसका केयर टेकर। चंद मिनट में हम लोगों को अपने अपने कमरे दिखाकर दौड़कर चाय ले आया। उसने भी सलाह दी कि अब आप लोग सो लें तो ज्यादा बेहतर होगा। दोपहर के बारह बज रहे थे। जैसे ही लेटे चंद मिनट में नींद ने अपने आगोश में ले लिया। करीब तीन घंटे बाद राहुल की एक भारी भरकम आवाज आई...अरे उठना नहीं है क्या...खाना वाना भी तो खाना है। चल उठ जा...दादा राहुल दत्ता काेलकाता से हैं। दिल्ली गेस्ट हाऊस से लेकर लेह तक में मेरे रूम पार्टनर भी :) जैसे तैसे उठे तो शरीर एकदम सा हल्का। हालांकि सोते वक्त जरूर मुझे भी सांस लेने में कठिनाई हुई लेकिन धीरे धीरे सब नॉर्मल होने लगा।
रअब हम लाग मेन मार्केट निकल चुके थे। मिट्टी की सड़कें। मिट्टी की दीवारें। आप कितना भी साफ सुधरे बनकर निकलें हो एक बार तो आपके जूतों से लेकर कपड़ों तक में धूल भर ही जानी है। मुझे बताया गया कि यहां पर बारिश नहीं होती है। यही वजह है कि अभी भी बहुत से पुराने घरों में या यूं कह लें ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने हैं। खैर...हम लोग एक रेस्ट्रांट पहुंचे। शायद वो लेह के अच्छे रेस्ट्रांट में रहा होगा। लेह में कोई भी नामी होटेल आैर कोई भी फेमस रेस्ट्रांट चेन नहीं है। करीब दो घंटे यहां बिताकर हम लोग फिर वापस अपने गेस्ट हाऊस को चल पड़े। क्योंकि शरीर को बेवजह थकाना नहीं था।
रात को जल्दी सोना भी था क्योंकि अगली सुबह लद्दाख के सबसे पुराने वंश द्रुपका लीनेज की हेमिस मॉनेस्ट्री भी जाना था। जो शहर से पचास किलोमीटर दूर और लेह शहर से ज्यादा ऊंचाई पर थी।
बंजर से भूरे रंग के पहाड़ों की चोटियां। बादलों की ओट में कभी छुप रहीं थी तो कभी सामने आने लगी। तभी फिर अनाउंस हुआ कि अब हम कुछ मिनट में लेह एयरपोर्ट पर लैंड करेंगे। बाहर का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस है। समुद्र तल से साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से लेह में ऑक्सीजन की मात्रा कम है। इसलिए आप लोगों को सलाह दी जाती है कि अपने शरीर को यहां के वातावरण के अनुकूल करने लिए कम से कम 24 घंटे आराम करने दें। पानी और लिक्विड डाइड ज्यादा से ज्यादा लें। हैपपी स्टे इन लद्दाख...इतना सुनते सुनते जहाज लैंड कर चुका था।
यह मेरी लेह की दूसरी विजिट थी। पहली विजिट महज कुछ घंटों की ही थी। जब 2010 में लेह में हुए क्लाउड बर्स्ट के दौरान सीआईआई और सेना ने यहां के गांवों को बसाया था और दिखाने के लिए लाए थे। स्वेटर से लेकर जैकेट तक बाहर आ चुके थे हालांकि पहनने की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन जहाज के कैप्टन के इंस्ट्रक्शन जरूर कानों में सुनाई पड़ रहे थे...अधिक ऊंचाई के चलते सांस लेने में दिक्क्त हो सकती है। लोकल हॉस्पिटल से लेकर सेना के अस्पताल में तक में आप एडवाइस ले सकते हैं आदि आदि।
एयरपोर्ट के बाहर पहुंचते ही सामने दिखते बेइंतहां खूबसूरत शांति स्तूपा की चमक आपको एक अलग दुनिया का अहसास कराती है। सूरज की रोशनी से नहाए हुए भूरे और गोल्डेन कलर के पहाड़ और उनके पीछे एकदम नीले रंग का आसमान मानों लगता हो कोई कैनवास पर उकेरी गई तस्वीर बनी हो। लेह लद्दाख एक ऐसा इलाका है जहां हर वक्त यह महसूस कर सकते हैं कि नीले हो चले आकाश को आप कभी भी छू सकते हो।
नीले आकाश और सुनहरे पहाड़ों में खोया हुआ ही था कि...पीछे से आवाज आई...अबे आशीष...तू अभी भी वैसा है या कुछ बदल गया है...मैंने पीछे मुड़कर देखा तो शायदा जी अपने बैग खींचते हुए और मुझसे यह पूछते हुए आगे बढ़ी चली आ रहीं थी। मैंने भी मुस्कराते हुए उनका इस्तकबाल किया और कहा... कुछ दिन आप साथ रहेंगी...पता ही चल जाएगा बदला हूं या नहीं। शायदा जी को मैं पिछले करीब ग्यारह सालों से जानता हूं। चंडीगढ़ में मैंने उनके साथ काम किया। हालांकि लेह में उनसे मुलाकात तकरीबन छह साल बाद हुई। शायदा जी को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। लेकिन कुछ समय में उनको राहत मिली लेकिन गेस्ट हाऊस पहुंंच कर।
करीब बीस मिनट की दूरी तय करने के बाद हम लोग एक खूबसूरत से एक घर नुमा गेस्ट हाऊस 'मांग्यूल' पहुंच चुके थे। चारों ओर खूबसूरत से पहाड़ों के बीच में बना यह बेइंतहा खूबसूरत गेस्ट हाऊस और उससे भी प्यारा उसका केयर टेकर। चंद मिनट में हम लोगों को अपने अपने कमरे दिखाकर दौड़कर चाय ले आया। उसने भी सलाह दी कि अब आप लोग सो लें तो ज्यादा बेहतर होगा। दोपहर के बारह बज रहे थे। जैसे ही लेटे चंद मिनट में नींद ने अपने आगोश में ले लिया। करीब तीन घंटे बाद राहुल की एक भारी भरकम आवाज आई...अरे उठना नहीं है क्या...खाना वाना भी तो खाना है। चल उठ जा...दादा राहुल दत्ता काेलकाता से हैं। दिल्ली गेस्ट हाऊस से लेकर लेह तक में मेरे रूम पार्टनर भी :) जैसे तैसे उठे तो शरीर एकदम सा हल्का। हालांकि सोते वक्त जरूर मुझे भी सांस लेने में कठिनाई हुई लेकिन धीरे धीरे सब नॉर्मल होने लगा।
रअब हम लाग मेन मार्केट निकल चुके थे। मिट्टी की सड़कें। मिट्टी की दीवारें। आप कितना भी साफ सुधरे बनकर निकलें हो एक बार तो आपके जूतों से लेकर कपड़ों तक में धूल भर ही जानी है। मुझे बताया गया कि यहां पर बारिश नहीं होती है। यही वजह है कि अभी भी बहुत से पुराने घरों में या यूं कह लें ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने हैं। खैर...हम लोग एक रेस्ट्रांट पहुंचे। शायद वो लेह के अच्छे रेस्ट्रांट में रहा होगा। लेह में कोई भी नामी होटेल आैर कोई भी फेमस रेस्ट्रांट चेन नहीं है। करीब दो घंटे यहां बिताकर हम लोग फिर वापस अपने गेस्ट हाऊस को चल पड़े। क्योंकि शरीर को बेवजह थकाना नहीं था।
रात को जल्दी सोना भी था क्योंकि अगली सुबह लद्दाख के सबसे पुराने वंश द्रुपका लीनेज की हेमिस मॉनेस्ट्री भी जाना था। जो शहर से पचास किलोमीटर दूर और लेह शहर से ज्यादा ऊंचाई पर थी।
Thursday, September 22, 2016
...लो चांद निकल आया
भोर के पांच बज रहे थे। और मेरी ट्रेन कालका स्टेशन पर पहुंच रही थी। हम तकरीबन चालीस लोग थे। सभी स्नातक अंतिम वर्ष के भूगोल के छात्र थे। स्टडी टूर पर हिमाचल प्रदेश जाना था। सो श्मिला के लिए कालका से ट्वाय ट्रेन पकडऩी थी। एक अजब सा उल्लास था। होता भी क्यों न। इतने सारे दोस्तों के साथ पहली बार घूमने जो निकले थे।सभी साथी स्टेशन पर खड़ी छोटी ट्रेन में सवार हुए। तकरीबन साढ़े आठ बजे टे्रन एक लंबी सीटी के साथ चल पड़ी। और शुरू हुआ ऐसा सफर जो आज तक नहीं भूला, न ही कभी भूल पाऊंगा।
खैर...ट्रेन में मैंं अपने दोस्तों के साथ बैठा था। उनमें कुछ लड़के थे और कुछ लड़कियां। मस्ती हो रही थी। मेरे सामने वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला भी बैठीं थी। उनके साथ में यही कोई आठ दस साल का शायद उनका पोता रहा होगा वह भी बैठा था। वह दादी हम लोगों की शैतानियों को देखती और फिर मुस्कुराने लगती। वैसे तो शिमला तक का अमूमन सफर इस ट्रेन से पांच घंटे का होता है। चूंकि ये हम लोगों का पहला सफर था शायद इसीलिए बहुत लंबा हो गया।
ट्वॉय ट्रेन कालका से चलकर इस रूट पर पडऩे वाले सनवारा स्टेशन पर जाकर रुक गई। समय यही कोई उस वक्त साढ़े दस बजे का रहा होगा। ट्रेन कछ देर तक नहीं चली। जानकारी लेने के बाद पता चला कि ट्रेन का इंजन खराब हो गया है। शिमला से दूसरा इंजन आएगा तभी ट्रेन चलेगी। हम लोगों ने कहा कि चलो...बहुत ही अच्छा है। पहाड़ों के बीच रुककर खूब मस्ती करेंगे। हम लोगों ने की भी खूब मस्ती। छह घंटे गुजर गए यानीकि साढ़े चार बजने को हो गए। तब तक इंजन नहीं आया था।
अक्टूबर का महीना था सो हल्की सी ठंड भी होने लगी थी। कुछ समय बाद इंजन भी आ गया और ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी। उसी सीट पर मैं जाकर बैठ गया जहां पर पहले बैठा था। सामने वहीं दादी बैठी हुई थी। उनके पास कुछ सामान था। वह बार बार अपने पास रखे सामान को सहेज लेती थी क्योंकि ट्रेन के हिलने डुलने पर वह इधर उधर हो जाता था। मैने उनसे पूछा कि दादी अगर इसमें कुछ टूटने वाला सामान हो तो मेरी सीट पर रख दीजिए मैं संभाल लूंगा। तो उन्होंने कहा कि बेटा...कुछ टूटने वाला नहीं है। इसमें तो मेरी बेटी की करवा चौथ की होने वाली पूजा का सामान है। जो कि मुझे उसके घर पर देना है। मेरी बेटी का पहला करवा चौथ है। पूजा का सामान मां के घर से ही जाता है। सो मैं लेके जा रही है। मैने उनकी बात को सुनकर सिर्फ अच्छा कह कर बाते करने मे लग गया। शाम के सात बज रहे थे। हम लोगों की ट्रेन शिमला नहीं पहुंची थी। पता चला कि अभी पहुंचते हुए एक से सवा घंटा और लग जाएगा। दादी ने भी पूछा कि बेटा कितना समय और लगेगा तो मैने बताया सवा घंटे। इतना सुनकर उन्होंने ट्रेन से बाहर की ओर झांका।
पहाडों को अंधेरे ने अपने आगोश में ले लिया था। कोई गांव आता था तो उसकी लाइटें ही टिमटिमाती हुई नजर आती थी। वह बार बार कुछ खास देखने की कोशिश कर रहीं थी। मैने फिर उनसे कहा कि हम लोग हैं आपके साथ इसलिए रात को परेशान होने की जरूरत नहीं है। तो उन्होंने बताया कि...बेटा मैं अपने लिए परेशान नहीं हो रही हूं...मैं तो अपनी उस बेटी के लिए परेशान हूं...जिसका आज पहला करवा चौथ का व्रत है...पौर पूजा का सारा सामान मेेरे पास है। चांद निकलने को है...पता नहीं कैसे होगी मेरी बेटी की पूजा...बस मैं यही बार बार देख रही हूं कि कहीं चांद तो नहीं निकल आया। उनका इतना सुनना वहां मौजूद सभी लोग ने बाहर से चांद को देखने की कोशिश की और कहा कि दादी अभी चांद नहीं निकला है।
ट्रेन तकरीबन सवा आठ बजे शिमला स्टेशन पर पहुंची। ठंड मानों शरीर को चीर रही हो। हम सभी लोग ट्रेन से उतरे। अपने सामान के साथ उन दादी का सामान भी स्टेशन पर उतार कर बाहर लेकर आए। एक बार फिर से आसमान की ओर देखा तो चांद नहीं निकला था...उनका दामाद दादी को लेने स्टेशन पर आया था। उससे परिचय भी हुआ...दादी अपनी बेटी के घर की ओर चल पड़ी...और हम लोग अपनी उस ठिकाने की ओर जहां पर रात बसर करनी थी...
मेरा होटल थोड़ा ऊंचाई पर था...ऊपर चढ़ ही रहा था तो देखा कि आसमान में पूरब दिशा से हल्की सी रोशनी हो रही है....ये रोशनी उस अंगड़ाई लेते हुए चांद की थी जो आज अनगिनत सुहागिनों को दीदार कराने के लिए निकल चुका था...चांद को देखकर बस दिल में एक ही बात रह रह कर कौंध रही थी कि पता नहींं वह दादी कहां तक पहुंची होंगी...घर पहुंच गईं होंगी या उनको भी हमारी तरह हल्की सी रोशनी के साथ चांद निकलता हुआ दिखा होगा...
Tuesday, March 15, 2016
हे माननीय 'बाहुबली घोड़ामार विधायक' सर...आपको शत शत नमन
आपकी तस्वीरें देखी। आपकी फड़कती हुई भुजाएं देखी। हाथ में दंड लेकर आपने जिस पौरुषत्व का प्रदर्शन किया। ऐसा निश्चित रूप से सिर्फ किसी 'वीर की भुजाएं' ही कर सकती है। मुझे गर्व है आप पर 'बाहुबली जी'।
मैंने बचपन से लेकर आज तक घोड़े के बारे में जब जब सुना तब तक महाराणाप्रताप का वो 'चेतक' ही याद आता था। लेकिन 'बाहुबली जी' आपने तो कमाल कर दिया। ऐसे चेतकों को छठी का दूध याद दिला दिया। यकीन मानिए 'बाहुबली सर' निश्चित रूप से आप जैसाा योद्धा अगर उन दिनों होता तो चेतक कब का मैदान छोड़ कर भाग जाता। नहीं भागता तो आप उसको भागने लायक ही नहीं छोड़ते।
आपने बहुत सही किया जो घोड़े को जमकर हौका। टांगे टूट गई तो टूट जाने दो।
पता नहीं बाहुबली सर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि घोड़ा साला असहिष्णु ही रहा होगा...वरना आपा जैसा 'सहिष्णु नेता' भला कहीं ऐसा करता। और सर... हो सकता है घोड़ा देशद्रोही भी हो। सहीं किया सर आपने। वैसे क्या कहा था घोड़े ने आपको ? क्योंकि इतना बलशााली शरीर पराक्रम के लिए यूं ही उतावला नहीं होता।
खैर...बाहुबली सर मुझे यकीन है आप की भुजाएं फड़क रहीं होगी। कस कस कर फड़क रहीं होगी। बार्डर के उस पार जो घोड़े रोज हमारी सरहदों की ओर देखकर
कांबिंग करते हैं उनको सबक सिखाने के लिए सर। सर एक दिन हो जाएं उधर भी दो दो हाथ। सर...आपको तो निश्चित रूप से अब तक 'घोड़ामार विधायक' की उपाधि मिल गई होगी।
आप महान हैं सर। हमारे देश को आप जैसे ही 'घोड़ामार विधायक' की बहुत जरूरत है।
आपने बहुत सही किया जो घोड़े को जमकर हौका। टांगे टूट गई तो टूट जाने दो।
पता नहीं बाहुबली सर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि घोड़ा साला असहिष्णु ही रहा होगा...वरना आपा जैसा 'सहिष्णु नेता' भला कहीं ऐसा करता। और सर... हो सकता है घोड़ा देशद्रोही भी हो। सहीं किया सर आपने। वैसे क्या कहा था घोड़े ने आपको ? क्योंकि इतना बलशााली शरीर पराक्रम के लिए यूं ही उतावला नहीं होता।
खैर...बाहुबली सर मुझे यकीन है आप की भुजाएं फड़क रहीं होगी। कस कस कर फड़क रहीं होगी। बार्डर के उस पार जो घोड़े रोज हमारी सरहदों की ओर देखकर
कांबिंग करते हैं उनको सबक सिखाने के लिए सर। सर एक दिन हो जाएं उधर भी दो दो हाथ। सर...आपको तो निश्चित रूप से अब तक 'घोड़ामार विधायक' की उपाधि मिल गई होगी।
आप महान हैं सर। हमारे देश को आप जैसे ही 'घोड़ामार विधायक' की बहुत जरूरत है।
--------------------------यह कविता तो बस यूं ही-------------------------
रण बीच चौकड़ी भर-भर करचेतक बन गया निराला था
राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था
जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था'''
गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं
निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग
हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग
राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था
जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था'''
गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं
निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग
हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग
Tuesday, April 21, 2015
...हां...हां...वो मैदान ही है...अमृत
अमृत...तुम पहाड़ से नीचे गए हो कभी। हां...शाब...गया है न। नीचे गया है। बागडोगरा जाता रहता है। शाब लोग मेम शाब लोग आता है न। उनको एयरपोर्ट लेने जाता है। कभी न्यूजलपाई गुड़ी भी हो आता है। हम्म्म्म्म...शादी मना लिया है क्या तुमने अमृत। हां हां शाब...एक बेटी है मेरा। इंटर क्लास में है शाब। मुझे देखकर लगता नहीं है न शाब कि मैं शादीशुदा है...इतना कहते हुए अमृत मुस्कराने लगा। और मैं उसकी टाटा सूमों गाड़ी में अगली सीट पर बैठे कर ऐसे ही बाते करते हुए टाइम पास करने लगा।
इस बातचीत को दो साल होने को हैं। मैं चंडीगढ़ से लखनऊ आ गया और अमृत अभी भी उन्हीं सिक्किम की पहाड़ी वादियों में लोगों को घुमाता फिराता है।
आज मेरा वीकली ऑफ था। सो शाम को फैमिली के साथ कहीं निकला था। रास्ते में अचानक एक कॉल आई। जब तक उठाता तब तक फोन कट गया। दोबारा फिर कॉल आई और उठाने पर एक अंजानी सी आवाज आई...हेलो...आशीष शाब बोल रहे हैं...जवाब हां में दिया तो उधर से फिर से आई आवाज ने मेरी आंखें नम कर दी। वो आवाज मेरे दिल में घर करती चली गई और मैं गाड़ी को किनारे लगाकर आंखे नम करता। ये अमृत था। अमृत क्षेत्री। सिक्किम से। आज अमृत की बेटी दीक्षा की शादी है।
अमृत से मेरा कोई पुराना संबंध नहीं है। दो साल से ही जानता हूं उसको। लेकिन यह जान पहचान एक घर के किसी सदस्य और बेहद करीबी सी है। मैं दो साल पहले सिक्किम टूर गया था तो मेरी गाड़ी का ड्राइवर अमृत ही था। करीब बारह दिनों के इस टूर में ऐसा कुछ हुआ कि अमृत और उसके परिवार से बहुत नजदीकियां हो गई। दरअसल हआ ये कि एक दिन हम लोगोें को कहीं जाना था और अमृत गाड़ी लेकर नहीं आया। अमृत के न आने का कारण जब पता चला तो मैं अपना प्रोग्राम पोस्टपोन करके उसके घर चला गया। उस दिन उसकी शुगर बहुत बढ़ बई थी। अमृत को कई सालों से डाइबिटीज थी। घर वालों के लाख कहने के बाद भी वह इलाज नहीं ले रहा था। इस बात को लेकर उसके घर वाले डरे रहते थे कि कहीं अमृत को कुछ हो गया तो उनकी पूरी दुनिया ही उजड़ जाएगी। पता नहीं अमृत को क्या लगा कि उसने मेरा कहा मान कर अपनी सारी जांचे करवाई। उसकी शुगर हायर लेवल तक बढ़ी थी। मैंने अपने एक डॉक्टर दोस्त से चंडीगढ़ पीजीआई में सारी रिपोर्ट मेल से भिजवा कर दिखलाई। मामला रिस्की हो चुका था। कई आर्गन पर असर पड़ना शुरू हो गया था। लेकिन उसको कुछ मेडिसिन दी गई। वो डॉक्टर की एडवाइस पर दवा लेता रहा है और मैं अपने टूर के आखिरी पांच दिनों तक रोजाना उसको देखने जाता था। एक अटूट सा रिश्ता हो गया था। नार्थ सिक्किम जिले के एक बियावान इलाके में उसका गांव था। जहां पर अमूमन छह महीने से ज्यादा दिनों तक बर्फ जमी रहती है। गर्मियों में वह सिक्किम शहर में आ जाता है। बाकी के दिनों में अपने बूढ़े मांप के साथ वापस गांव में चला जाता है। और वहीं से छोटा मोटा कारोबार कर लेता है गाड़ी चलाने का।
खैर, सिक्किम से मैं वापस आ गया चंडीगढ़। आने के बाद कई बार अमृत से बातचीत होती रही। इसी बीच मैंने नौकरी बदली और लखनऊ आ गया। लखनऊ आने के बाद मेरे बहुत से नंबर गुम हो गए और उसी में गुम हो गया अमृत का नंबर। कुछ दिनों तक उसका इधर उधर से नंबर तलाशा। लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।
आज शाम को अचानक आए उसके फोन से ऐसा लगा कि शायद कोई अपना बरसों से बिछड़ा हुआ मिल गया हो। फोन पर उसकी आवाज से लग रहा था कि वो रो रहा है लेकिन आंसू बाहर नहीं गिर रहे होंगे। मेरी भी पलके गीली हो रही थी। कहने लगा कि शाब...आपका नंबर मैंने चंडीगढ़ वाले डॉक्टर शाब से लिया है। आप लखनऊ चले गए। बताया भी नहीं। नंबर भी नहीं दिया। शाब...हम ड्राइवर लोग...क्यों आप मेरा नंबर रखेगा...क्यों बताएगा शाब, हम लोगों को। हम लोग दस बारह दिन ही तो साथ रहा था। आप लोगों को ऐसा बहुत सा ड्राइवर मिलता होगा। लेकिन शाब...लेकिन शाब...इतना कहते हुए वो फफक पड़ा। कुछ सेंकेंड की चुप्पी के बाद बोला...शाब, आज मेरी गुड़िया की शादी है। आप आएगा नहीं। आपने ही तो कहा था कि...अमृत तुम जल्दी ठीक हो जाओ...और अपनी बेटी की शादी करो। अब मैं ठीक हो गया हूं। आज हम लोग अपनी गुड़िया का शादी मना रहा है...पता है शाब...गुड़िया की शादी सेना में काम करने वाले से हो रहा है...इससे भी ज्यादा उसको यह बात बताने में गर्व महसूस हुआ कि...
शाब...हम लोग तो पहाड़ से नीचे कभी नहीं उतर पाया। लेकिन आपको मालूम हैं मेरी गुड़िया गोरखा रेजीमेंट में जलंधर जा रहा है। उसका पति वहींं पोस्वोट है। हंसते हुए उसने पूछा...शाब जी, वो पहाड़ तो नहीं है...इतना कहते हुए मैं भी हंस पड़ा...हां...हां...अमृत...वो मैदान ही है...
Saturday, July 5, 2014
फिर मिलेंगे....:)
चंडीगढ़ से निकलते हुए काफी लेट हो गया था। शिमला
तक पहुंचते पहुंचते तो शाम होने को आ गई थी। बहुत दूर जाना था। शिमले से भी ऊपर। ठियोग
से भी आगे। मशोबरा तक पहुंचते पहुंचते पहाड़ घुप्प अंधेरे में डूब गए थे। दूर पहाड़ों
पर लाइटें टिमटिमाने लगी थीं। मैने अपनी कार की लाइटें भी जला दी थी। धुंध इतनी तेज
थी कि पूछो मत। गाड़ी की स्पीड बहुत कम थी। सुनसान रास्ते में कोई आने जाने वाला भी
नहीं दिख रहा था। अगर कोई दिख रहा था तो वह थे घोड़े और उनको ले जाने वाले कुछ लोग।
जो कुफरी में रोज सुबह अपने धंधे पानी की तलाश में निकलने के बाद रात को वापस घर लौट
रहे थे। अंजान रास्ता। मेरी कार की स्पीड चाहते हुए भी तेज नहीं हो पा रही थी। ठियोग
पहुंचते ही फोन आया…हेलो…सर...कहां तक पहुंचे। मैंने लोकेशन
बताई। तो उधर से अवाज आई…अच्छा ठीक है। तो आपको पहुंचते
हुए नौ बज जाएंगे। मैंने भी कहां हां लग तो रहा है। शायद और ज्यादा ही वक्त लग जाए।
क्योंकि धुंध बहुत है। वैसे यू डोंट वरी। मुझे आपके गांव का नाम पता है। सड़क पर ही
है। मैं पहुंच जाऊंगा।
ये निशा के पति देवेश का फोन था। वहीं निशा जिसने
कभी हमारे साथ काम किया था। मैं ट्रेनी जर्नलिस्ट था अमर उजाला चंडीगढ़ में। और निशा
हिमाचल से मॉस कॉम की पढ़ाई पूरी करके इंटर्नशिप करने चंडीगढ़ आई थी। सीनियर था उसका
सो रिस्पेक्ट बहुत करती थी। निशा की शादी कब हुई इसका पता नहीं लेकिन उससे सात साल
बाद मुलाकात 2012 चंडीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में हुई थी। मुझे याद है एक शाम मैं खबरों
को लिखने में लगा था। तभी फोन बजा। उधर से आवाज आई। हेलो सर…सर मैं निशा…निशा जिंटा। आपने मुझे पहचाना।
मैं कुछ जवाब देता इतने में उधर से फिर आवाज आई। अरे सर मैं वहीं हूं जो आपके यहां
इंटर्नशिप करने आई थी। शिमला से। कुछ याद आया। हां…हां...याद आया। अरे निशा…इतने सालों बाद। क्या हाल है
तुम्हारा। फिर उधर से जो आवाज आई वो रुंधे गले से थी। उसने बताया कि मेरे पति का शिमला
से पहले बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। वो रोहड़ू से बस से शिमला आ रहे थे। बस खड्ड
में गिर गई। उनको बहुत चोट आई है। डॉक्टरों ने कहा है कि स्पाइन की सर्जरी होगी। रिस्क
बहुत बताया है। कहां है कि जान भी जा सकती है। इतना कहते हुए वह फोन पर ही रोने लगी।
प्लीज कुछ करके उनको बचा लो। मैंने अपने जानने वाले एक डॉक्टर से सारा मामला बताया।
तो उन्होंने अगली सुबह उसको चंडीगढ़ बुलाया। पूरा एक्जॉमिन करने के बाद उसका इलाज शुरू
हुआ। एक महीने से ज्यादा इलाज चला अस्पताल में। मैं उसके पति से भी मिला। डॉक्टर ने
नई जिंदगी दी थी इसलिए पति पत्नी बहुत खुश थे। इलाज के बाद दोनों हिमाचल वापस अपने
गांव चले गए।
उसके बाद दोनों लोगों ने मुझे अपने गांव
बहुत बुलाया। देवेश वहां के सरकारी इंटर कालेज में कहीं लेक्चरर है। निशा पता नहीं
क्या कर रही है। लेकिन उसके एप्पल के आर्चर्ड हैं। खैर लगातार फोन आते गए देवेश और निशा के। बहुत बार अपने
गांव बुलायर लेकिन मैं पहुंच नहीं पाया। इसी दौरान मेरे चंडीगढ़ से बोरिया बिस्तरा
पैक करने का वक्त भी आ गया। अमर उजाला में नोटिस पर चल रहा था। बारी थी घूमने की। सो
देवेश और निशा के गांव चल पड़े।
तभी देवेश का गांव आ गया। एक दम सुनसान
इलाके में। मई के महीने में भी ऐसा लग रहा था कि यहां पारा जम चुका हो। आकाश में तारे
टिमटिमा रहे थे। दूर…बहुत दूर…कहीं चांद निकलने की कोशिश कर रहा था। आधी रात हो
चुकी थी। मैं अपनी वाइफ और बेटे के साथ गाडी से उतरा। देवेश और निशा समेत पूरा घर इंतजार
कर रहा था। रात को खूब देर तक गप्पे मारी। फिर हम लोग सोने चले गए।
सुबह आंख खुली तो हमेशा की तरह सात आठ अखबार
मेरे बेड पर पड़े थे। लखनऊ में कहने भर को मानसून पहुंच चुका था। सड़ी हुई गर्मी अभी
भी मुंह चिढ़ा रही थी। एक खूबसूरत हसीन सपना जो पिछले साल हकीकत में था वो फिलहाल टूट
चुका था…J
Saturday, November 30, 2013
चांद, रात और मनाली गांव
रात का शायद कोई तीसरा पहर रहा होगा। कमरे की
खिड़की खुली हुई थी। दूर आसमान में चमकता हुआ चांद सामने की पहाड़ी पर बिछी बर्फ को
और भी खूबसूरत कर रहा था। दिन में रोमांस की लहर पैदा करने वाली ब्यास नदी की कल कल
रात के सन्नाटे में बहुत डरावनी लग रही थी। अचानक खुली नींद में मैंने देखा कि सौरभ
सो रहा है। मैं फिर रजाई में घुस गया। चारो ओर से रजाई को दबाया लेकिन नींद नहीं आई।
फिर थोड़ी देर बाद मै चुपचाप उठा। कमरे का दरवाजा खोला। तीसरी मंजिल पर बने होटल के
कमरे से नीचे आया। देखा, मनाली गांव की पतली सड़के सुनसान थी। हालांकि पास वाले रेस्त्रां
में जरूर कुछ इजारायली लंबी कश के छल्ले उड़ाकर गिटार पर कुछ गुनगुना रहे थे। उसको
अनसुना कर मैं गांव की ऊंपरी चोटी पर चल दिया।
यह बात शायद दो साल पुरानी होगी। हम लोग चंडीगढ़
से मनाली में ‘ समर सनडाउनर्स ‘कार्यक्रम को कवर कनने गए थे। जिसमें अमर उजाला से मैं,
दैनिक भास्कर से सौरभ द्विवेदी, पंजाब केसरी से राकेश, एचटी से फोटो जर्नलिस्ट कात्याल
जी एक महिला रिपोर्टर (जिनका मुझे नाम नहीं
याद आ रहा)। हां, विश्व भारती भी था एचटी से। चूंकि उसकी ससुराल कुल्लू में हैं इालिए
वह ऐसे ही मनाली आया था। खैर, एक बिजी शाम को बेहतरीन गांनों का आनंद लेने के बाद सभी
लोग होटल पहुंचे। गपशप मारी और सोने चले गए। मैं और सौरभ एक रूम में थे। हम लोग बाते
वाते करते करते सो गए लेकिन मेरी नींद आधी रात के बाद टूट गई। मैं कमरे से उतर कर मनाली
गांव की ओर चल दिया। दरअसल हम लोग जिस होटल में रुके थे। उसके मालिक नरेन्द्र शर्मा
जी मनाली गांच के ही रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनका घर गांव की सबसे ऊपरी चोटी
पर मनु मंदिर के एक दम पास में है। बातचीत में उन्होंने बताया था कि सुबह सुबह मंदिर
के कपाट खोलने की प्रक्रिया और फिर सन राइज के वक्त स्नो पीक्स की खूबसूरती अपने में
अलग ही होती है। मैं इसी धुन में गांव की ओर चला जा रहा था। मोबाइल में घ़डी तकरीबन
पौने तीन बजा रही थी। हजारों साल पुराने मनाली गांव के घर दूधिया रोशनी में अलग ही
दिख रहे थे। मैं बढ़ा चला जा रहा था। तकरीबन आधे घंटे की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई के बाद
मैं मनु मंदिर की चौखट पर था। ठंडी हवा तन और मन दोनों को को चुभो रही थी। लेकिन इस
अहसास में कि कुछ तो नया देखने को मिलेगा। मैने नरेन्द्र का फोन मिलाया। मंदिर के बगल
वाले घर से ही फोन की घंटी सुनाई दी। बेहद पुराना घर। लकड़ी का बना दो मंजिला। ग्राउंड
फ्लोर पर गायों के खाने के लिए चारे का इंतजाम और उनके रहने का बंदोबस्त। बाहर से ही
बनी सीढ़ियों से ऊपर जाकर घर वालों के रहने का इंतजाम। मनाली गांव के सभी घर ऐसे ही
बने हैं। खैर, फोन उठाते ही नरेन्द्र को अपना परिचय दिया। वह नीचे आए। अब तकरीबन पौने
चार होने को था। मंदिर के कपाट खुलने थे। पुरोहित ने पूजा अर्चना कर मंदिर के कपाट
खोले। तकरीबन आधे गांव के लोग आ गए। पूजा अर्चना की। इसी के साथ सामने ग्लेशियर पर
पड़ी बर्फ ने भी अपना रंग सफेद से बदल कर सुनहरा करना शुरू कर दिया था। नीचे घाटी में
घनघोर अंधेरा और ऊपर की पहाड़ी पर पड़ी बर्फ का सुनहरा पन। नरेन्द्र से होटल में मिलने
की बात कह कर मैं वापस अपने होटल आ गया। देखा सौरभ भाई अभी भी सो रहे हैं। मैंने भी
रजाई उठाई और लंबी तान के सो गया।
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