Tuesday, March 15, 2016

हे माननीय 'बाहुबली घोड़ामार विधायक' सर...आपको शत शत नमन

आपकी तस्वीरें देखी। आपकी फड़कती हुई भुजाएं देखी। हाथ में दंड लेकर आपने जिस पौरुषत्व का प्रदर्शन किया। ऐसा निश्चित रूप से सिर्फ किसी 'वीर की भुजाएं' ही कर सकती है। मुझे गर्व है आप पर 'बाहुबली जी'।
मैंने बचपन से लेकर आज तक घोड़े के बारे में जब जब सुना तब तक महाराणाप्रताप का वो 'चेतक' ही याद आता था। लेकिन 'बाहुबली जी' आपने तो कमाल कर दिया। ऐसे चेतकों को छठी का दूध याद दिला दिया। यकीन मानिए 'बाहुबली सर' निश्चित रूप से आप जैसाा योद्धा अगर उन दिनों होता तो चेतक कब का मैदान छोड़ कर भाग जाता। नहीं भागता तो आप उसको भागने लायक ही नहीं छोड़ते।
आपने बहुत सही किया जो घोड़े को जमकर हौका। टांगे टूट गई तो टूट जाने दो।
पता नहीं बाहुबली सर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि घोड़ा साला असहिष्णु ही रहा होगा...वरना आपा जैसा 'सहिष्णु नेता' भला कहीं ऐसा करता। और सर... हो सकता है घोड़ा देशद्रोही भी हो। सहीं किया सर आपने। वैसे क्या कहा था घोड़े ने आपको ? क्योंकि इतना बलशााली शरीर पराक्रम के लिए यूं ही उतावला नहीं होता।
खैर...बाहुबली सर मुझे यकीन है आप की भुजाएं फड़क रहीं होगी। कस कस कर फड़क रहीं होगी। बार्डर के उस पार जो घोड़े रोज हमारी सरहदों की ओर देखकर
कांबिंग करते हैं उनको सबक सिखाने के लिए सर। सर एक दिन हो जाएं उधर भी दो दो हाथ। सर...आपको तो निश्चित रूप से अब तक 'घोड़ामार विधायक' की उपाधि मिल गई होगी।
आप महान हैं सर। हमारे देश को आप जैसे ही 'घोड़ामार विधायक' की बहुत जरूरत है।
--------------------------यह कविता तो बस यूं ही-------------------------
रण बीच चौकड़ी भर-भर करचेतक बन गया निराला था
राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था
जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था'''
गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं
निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग
हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग

Tuesday, April 21, 2015

...हां...हां...वो मैदान ही है...अमृत


अमृत...तुम पहाड़ से नीचे गए हो कभी। हां...शाब...गया है न। नीचे गया है। बागडोगरा जाता रहता है। शाब लोग मेम शाब लोग आता है न। उनको एयरपोर्ट लेने जाता है। कभी न्यूजलपाई गुड़ी भी हो आता है। हम्म्म्म्म...शादी मना लिया है क्या तुमने अमृत। हां हां शाब...एक बेटी है मेरा। इंटर क्लास में है शाब। मुझे देखकर लगता नहीं है न शाब कि मैं शादीशुदा है...इतना कहते हुए अमृत मुस्कराने लगा। और मैं उसकी टाटा सूमों गाड़ी में अगली सीट पर बैठे कर ऐसे ही बाते करते हुए टाइम पास करने लगा।
इस बातचीत को दो साल होने को हैं। मैं चंडीगढ़ से लखनऊ आ गया और अमृत अभी भी उन्हीं सिक्किम की पहाड़ी वादियों में लोगों को घुमाता फिराता है।
आज मेरा वीकली ऑफ था। सो शाम को फैमिली के साथ कहीं निकला था। रास्ते में अचानक एक कॉल आई। जब तक उठाता तब तक फोन कट गया। दोबारा फिर कॉल आई और उठाने पर एक अंजानी सी आवाज आई...हेलो...आशीष शाब बोल रहे हैं...जवाब हां में दिया तो उधर से फिर से आई आवाज ने मेरी आंखें नम कर दी। वो आवाज मेरे दिल में घर करती चली गई और मैं गाड़ी को किनारे लगाकर आंखे नम करता। ये अमृत था। अमृत क्षेत्री। सिक्किम से। आज अमृत की बेटी दीक्षा की शादी है।
अमृत से मेरा कोई पुराना संबंध नहीं है। दो साल से ही जानता हूं उसको। लेकिन यह जान पहचान एक घर के किसी सदस्य और बेहद करीबी सी है। मैं दो साल पहले सिक्किम टूर गया था तो मेरी गाड़ी का ड्राइवर अमृत ही था। करीब बारह दिनों के इस टूर में ऐसा कुछ हुआ कि अमृत और उसके परिवार से बहुत नजदीकियां हो गई। दरअसल हआ ये कि एक दिन हम लोगोें को कहीं जाना था और अमृत गाड़ी लेकर नहीं आया। अमृत के न आने का कारण जब पता चला तो मैं अपना प्रोग्राम पोस्टपोन करके उसके घर चला गया। उस दिन उसकी शुगर बहुत बढ़ बई थी। अमृत को कई सालों से डाइबिटीज थी। घर वालों के लाख कहने के बाद भी वह इलाज नहीं ले रहा था। इस बात को लेकर उसके घर वाले डरे रहते थे कि कहीं अमृत को कुछ हो गया तो उनकी पूरी दुनिया ही उजड़ जाएगी। पता नहीं अमृत को क्या लगा कि उसने मेरा कहा मान कर अपनी सारी जांचे करवाई। उसकी शुगर हायर लेवल तक बढ़ी थी। मैंने अपने एक डॉक्टर दोस्त से चंडीगढ़ पीजीआई में सारी रिपोर्ट मेल से भिजवा कर दिखलाई। मामला रिस्की हो चुका था। कई आर्गन पर असर पड़ना शुरू हो गया था। लेकिन उसको कुछ मेडिसिन दी गई। वो डॉक्टर की एडवाइस पर दवा लेता रहा है और मैं अपने टूर के आखिरी पांच दिनों तक रोजाना उसको देखने जाता था। एक अटूट सा रिश्ता हो गया था। नार्थ सिक्किम जिले के एक बियावान इलाके में उसका गांव था। जहां पर अमूमन छह महीने से ज्यादा दिनों तक बर्फ जमी रहती है। गर्मियों में वह सिक्किम शहर में आ जाता है। बाकी के दिनों में अपने बूढ़े मांप के साथ वापस गांव में चला जाता है। और वहीं से छोटा मोटा कारोबार कर लेता है गाड़ी चलाने का।
खैर, सिक्किम से मैं वापस आ गया चंडीगढ़। आने के बाद कई बार अमृत से बातचीत होती रही। इसी बीच मैंने नौकरी बदली और लखनऊ आ गया। लखनऊ आने के बाद मेरे बहुत से नंबर गुम हो गए और उसी में गुम हो गया अमृत का नंबर। कुछ दिनों तक उसका इधर उधर से नंबर तलाशा। लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।
आज शाम को अचानक आए उसके फोन से ऐसा लगा कि शायद कोई अपना बरसों से बिछड़ा हुआ मिल गया हो। फोन पर उसकी आवाज से लग रहा था कि वो रो रहा है लेकिन आंसू बाहर नहीं गिर रहे होंगे। मेरी भी पलके गीली हो रही थी। कहने लगा कि शाब...आपका नंबर मैंने चंडीगढ़ वाले डॉक्टर शाब से लिया है। आप लखनऊ चले गए। बताया भी नहीं। नंबर भी नहीं दिया। शाब...हम ड्राइवर लोग...क्यों आप मेरा नंबर रखेगा...क्यों बताएगा शाब, हम लोगों को। हम लोग दस बारह दिन ही तो साथ रहा था। आप लोगों को ऐसा बहुत सा ड्राइवर मिलता होगा। लेकिन शाब...लेकिन शाब...इतना कहते हुए वो फफक पड़ा। कुछ सेंकेंड की चुप्पी के बाद बोला...शाब, आज मेरी गुड़िया की शादी है। आप आएगा नहीं। आपने ही तो कहा था कि...अमृत तुम जल्दी ठीक हो जाओ...और अपनी बेटी की शादी करो।  अब मैं ठीक हो गया हूं। आज हम लोग अपनी गुड़िया का शादी मना रहा है...पता है शाब...गुड़िया की शादी सेना में काम करने वाले से हो रहा है...इससे भी ज्यादा उसको यह बात बताने में गर्व महसूस हुआ कि...
शाब...हम लोग तो पहाड़ से नीचे कभी नहीं उतर पाया। लेकिन आपको मालूम हैं मेरी गुड़िया गोरखा रेजीमेंट में जलंधर जा रहा है। उसका पति वहींं पोस्वोट है। हंसते हुए उसने पूछा...शाब जी, वो पहाड़ तो नहीं है...इतना कहते हुए मैं भी हंस पड़ा...हां...हां...अमृत...वो मैदान ही है...

Saturday, July 5, 2014

फिर मिलेंगे....:)




 
चंडीगढ़ से निकलते हुए काफी लेट हो गया था। शिमला तक पहुंचते पहुंचते तो शाम होने को आ गई थी। बहुत दूर जाना था। शिमले से भी ऊपर। ठियोग से भी आगे। मशोबरा तक पहुंचते पहुंचते पहाड़ घुप्प अंधेरे में डूब गए थे। दूर पहाड़ों पर लाइटें टिमटिमाने लगी थीं। मैने अपनी कार की लाइटें भी जला दी थी। धुंध इतनी तेज थी कि पूछो मत। गाड़ी की स्पीड बहुत कम थी। सुनसान रास्ते में कोई आने जाने वाला भी नहीं दिख रहा था। अगर कोई दिख रहा था तो वह थे घोड़े और उनको ले जाने वाले कुछ लोग। जो कुफरी में रोज सुबह अपने धंधे पानी की तलाश में निकलने के बाद रात को वापस घर लौट रहे थे। अंजान रास्ता। मेरी कार की स्पीड चाहते हुए भी तेज नहीं हो पा रही थी। ठियोग पहुंचते ही फोन आयाहेलोसर...कहां तक पहुंचे। मैंने लोकेशन बताई। तो उधर से अवाज आईअच्छा ठीक है। तो आपको पहुंचते हुए नौ बज जाएंगे। मैंने भी कहां हां लग तो रहा है। शायद और ज्यादा ही वक्त लग जाए। क्योंकि धुंध बहुत है। वैसे यू डोंट वरी। मुझे आपके गांव का नाम पता है। सड़क पर ही है। मैं पहुंच जाऊंगा।
ये निशा के पति देवेश का फोन था। वहीं निशा जिसने कभी हमारे साथ काम किया था। मैं ट्रेनी जर्नलिस्ट था अमर उजाला चंडीगढ़ में। और निशा हिमाचल से मॉस कॉम की पढ़ाई पूरी करके इंटर्नशिप करने चंडीगढ़ आई थी। सीनियर था उसका सो रिस्पेक्ट बहुत करती थी। निशा की शादी कब हुई इसका पता नहीं लेकिन उससे सात साल बाद मुलाकात 2012 चंडीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में हुई थी। मुझे याद है एक शाम मैं खबरों को लिखने में लगा था। तभी फोन बजा। उधर से आवाज आई। हेलो सरसर मैं निशानिशा जिंटा। आपने मुझे पहचाना। मैं कुछ जवाब देता इतने में उधर से फिर आवाज आई। अरे सर मैं वहीं हूं जो आपके यहां इंटर्नशिप करने आई थी। शिमला से। कुछ याद आया। हांहां...याद आया। अरे निशा…इतने सालों बाद। क्या हाल है तुम्हारा। फिर उधर से जो आवाज आई वो रुंधे गले से थी। उसने बताया कि मेरे पति का शिमला से पहले बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। वो रोहड़ू से बस से शिमला आ रहे थे। बस खड्ड में गिर गई। उनको बहुत चोट आई है। डॉक्टरों ने कहा है कि स्पाइन की सर्जरी होगी। रिस्क बहुत बताया है। कहां है कि जान भी जा सकती है। इतना कहते हुए वह फोन पर ही रोने लगी। प्लीज कुछ करके उनको बचा लो। मैंने अपने जानने वाले एक डॉक्टर से सारा मामला बताया। तो उन्होंने अगली सुबह उसको चंडीगढ़ बुलाया। पूरा एक्जॉमिन करने के बाद उसका इलाज शुरू हुआ। एक महीने से ज्यादा इलाज चला अस्पताल में। मैं उसके पति से भी मिला। डॉक्टर ने नई जिंदगी दी थी इसलिए पति पत्नी बहुत खुश थे। इलाज के बाद दोनों हिमाचल वापस अपने गांव चले गए।
उसके बाद दोनों लोगों ने मुझे अपने गांव बहुत बुलाया। देवेश वहां के सरकारी इंटर कालेज में कहीं लेक्चरर है। निशा पता नहीं क्या कर रही है। लेकिन उसके एप्पल के आर्चर्ड हैं। खैर  लगातार फोन आते गए देवेश और निशा के। बहुत बार अपने गांव बुलायर लेकिन मैं पहुंच नहीं पाया। इसी दौरान मेरे चंडीगढ़ से बोरिया बिस्तरा पैक करने का वक्त भी आ गया। अमर उजाला में नोटिस पर चल रहा था। बारी थी घूमने की। सो देवेश और निशा के गांव चल पड़े।
तभी देवेश का गांव आ गया। एक दम सुनसान इलाके में। मई के महीने में भी ऐसा लग रहा था कि यहां पारा जम चुका हो। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। दूर…बहुत दूर…कहीं चांद निकलने की कोशिश कर रहा था। आधी रात हो चुकी थी। मैं अपनी वाइफ और बेटे के साथ गाडी से उतरा। देवेश और निशा समेत पूरा घर इंतजार कर रहा था। रात को खूब देर तक गप्पे मारी। फिर हम लोग सोने चले गए।
सुबह आंख खुली तो हमेशा की तरह सात आठ अखबार मेरे बेड पर पड़े थे। लखनऊ में कहने भर को मानसून पहुंच चुका था। सड़ी हुई गर्मी अभी भी मुंह चिढ़ा रही थी। एक खूबसूरत हसीन सपना जो पिछले साल हकीकत में था वो फिलहाल टूट चुका था…J

Saturday, November 30, 2013

चांद, रात और मनाली गांव


 

रात का शायद कोई तीसरा पहर रहा होगा। कमरे की खिड़की खुली हुई थी। दूर आसमान में चमकता हुआ चांद सामने की पहाड़ी पर बिछी बर्फ को और भी खूबसूरत कर रहा था। दिन में रोमांस की लहर पैदा करने वाली ब्यास नदी की कल कल रात के सन्नाटे में बहुत डरावनी लग रही थी। अचानक खुली नींद में मैंने देखा कि सौरभ सो रहा है। मैं फिर रजाई में घुस गया। चारो ओर से रजाई को दबाया लेकिन नींद नहीं आई। फिर थोड़ी देर बाद मै चुपचाप उठा। कमरे का दरवाजा खोला। तीसरी मंजिल पर बने होटल के कमरे से नीचे आया। देखा, मनाली गांव की पतली सड़के सुनसान थी। हालांकि पास वाले रेस्त्रां में जरूर कुछ इजारायली लंबी कश के छल्ले उड़ाकर गिटार पर कुछ गुनगुना रहे थे। उसको अनसुना कर मैं गांव की ऊंपरी चोटी पर चल दिया।

यह बात शायद दो साल पुरानी होगी। हम लोग चंडीगढ़ से मनाली में ‘ समर सनडाउनर्स ‘कार्यक्रम को कवर कनने गए थे। जिसमें अमर उजाला से मैं, दैनिक भास्कर से सौरभ द्विवेदी, पंजाब केसरी से राकेश, एचटी से फोटो जर्नलिस्ट कात्याल जी  एक महिला रिपोर्टर (जिनका मुझे नाम नहीं याद आ रहा)। हां, विश्व भारती भी था एचटी से। चूंकि उसकी ससुराल कुल्लू में हैं इालिए वह ऐसे ही मनाली आया था। खैर, एक बिजी शाम को बेहतरीन गांनों का आनंद लेने के बाद सभी लोग होटल पहुंचे। गपशप मारी और सोने चले गए। मैं और सौरभ एक रूम में थे। हम लोग बाते वाते करते करते सो गए लेकिन मेरी नींद आधी रात के बाद टूट गई। मैं कमरे से उतर कर मनाली गांव की ओर चल दिया। दरअसल हम लोग जिस होटल में रुके थे। उसके मालिक नरेन्द्र शर्मा जी मनाली गांच के ही रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनका घर गांव की सबसे ऊपरी चोटी पर मनु मंदिर के एक दम पास में है। बातचीत में उन्होंने बताया था कि सुबह सुबह मंदिर के कपाट खोलने की प्रक्रिया और फिर सन राइज के वक्त स्नो पीक्स की खूबसूरती अपने में अलग ही होती है। मैं इसी धुन में गांव की ओर चला जा रहा था। मोबाइल में घ़डी तकरीबन पौने तीन बजा रही थी। हजारों साल पुराने मनाली गांव के घर दूधिया रोशनी में अलग ही दिख रहे थे। मैं बढ़ा चला जा रहा था। तकरीबन आधे घंटे की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई के बाद मैं मनु मंदिर की चौखट पर था। ठंडी हवा तन और मन दोनों को को चुभो रही थी। लेकिन इस अहसास में कि कुछ तो नया देखने को मिलेगा। मैने नरेन्द्र का फोन मिलाया। मंदिर के बगल वाले घर से ही फोन की घंटी सुनाई दी। बेहद पुराना घर। लकड़ी का बना दो मंजिला। ग्राउंड फ्लोर पर गायों के खाने के लिए चारे का इंतजाम और उनके रहने का बंदोबस्त। बाहर से ही बनी सीढ़ियों से ऊपर जाकर घर वालों के रहने का इंतजाम। मनाली गांव के सभी घर ऐसे ही बने हैं। खैर, फोन उठाते ही नरेन्द्र को अपना परिचय दिया। वह नीचे आए। अब तकरीबन पौने चार होने को था। मंदिर के कपाट खुलने थे। पुरोहित ने पूजा अर्चना कर मंदिर के कपाट खोले। तकरीबन आधे गांव के लोग आ गए। पूजा अर्चना की। इसी के साथ सामने ग्लेशियर पर पड़ी बर्फ ने भी अपना रंग सफेद से बदल कर सुनहरा करना शुरू कर दिया था। नीचे घाटी में घनघोर अंधेरा और ऊपर की पहाड़ी पर पड़ी बर्फ का सुनहरा पन। नरेन्द्र से होटल में मिलने की बात कह कर मैं वापस अपने होटल आ गया। देखा सौरभ भाई अभी भी सो रहे हैं। मैंने भी रजाई उठाई और लंबी तान के सो गया।

 

Wednesday, May 1, 2013

लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...

सुबह पांच बजे उठा था। नहा धोकर तैयार हुआ। पौने छह बजे एयरफोर्स स्टेशन पर एक कार्यक्रम कवर करने पहुंचना था। सवा नौ बजे कार्यक्रम खत्म हुआ तो एक इंटरव्यू किया। वहां से सीधे मीटिंग के लिए दफ्तर भागा। सवा दस बजे के करीब ऑफिस पहुंचा। साढ़े ग्यारह बजे मीटिंग खत्म हुई। लिस्टिंग की। दफ्तर से नीचे उतरा। पौने बारह बजे पीजीआई पहुंचा। सवा बारह बजे वहां से निकला। अब तक चाय नहीं नसीब हुई थी। कुछ दोस्तों के साथ कैफे कॉफी डे पहुंचा। कॉफी का हलक गले से नीचे उतरा भी नहीं था कि भूकंप आ गया। कॉफी छोड़कर बाहर भागा। भूकंप की स्टोरी करने में जुट गया। मौसम विभाग के दफ्तर पहुंचा। भूकंप के आंकड़े जुटाए। तीन बज गए। वापस दफ्तर पहुंचा। कम्प्यूटर खोला। खबरे लिखनी शुरू की। डिफेंंस आफीसर का इंटरव्यू। इंडो-चाइना बार्डर के तनाव की स्टोरी। डिफेंस की रूटीन खबर। भूकंप की लाइव स्टोरी। भूंकप की आंकड़ेबाजी। रेलवे की अपनी खबर का असर। एलपीजी ऑटो वालों की हड़ताल। पीजीआई के डॉक्टरों के अवार्ड की खबर। कुछ विशेष ट्रेनों के चलाए जाने की खबर। नौ बजे गए खबरें लिखते लिखते। इसी बीच राजमा चावल जरूर खाए। साढ़े नौ बजे चेक चुक मार कर नीचे आया। गाड़ी उठाई। घर निकला। सवा दस बजे पंचकूला ऑफिस पहुंचा। वहां कैंटीन वाले ने बताया आज आपको खाना नसीब नहीं होगा। क्योंकि नॉनवेज बना है। पौने ग्यारह बजे घर पहुंचा। प्रिज खोला। दही निकाला। काले नमक के साथ मिक्स किया। खा लिया यह सोचकर कि चलो कुछ पेट ही कम हो जाएगा अगर एक रात खाना नहीं खाऊंगा।
पूरा दिन गुजर गया। पता ही नहीं चला कि आज वल्र्ड लेवर डे था। अभी फेसबुक पर अपडेट पढ़ा। लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...चेहरे पर मुस्कान खुद ब खुद यूं ही आ गई...

Sunday, November 4, 2012

काश, ये वोट बैंक होते

अगर भीड़ जीत का पैमाना होती तो शायद इंदिरा गांधी कभी न हारती। बाल ठाकरे जब जब हुंकार भरते पूरा मुंबई समुंदर की लहरों की तरह उनके पास सिमट आता। लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल हो गए। मायावती की एक आवाज पर हजारों हजार लोग दौड़े चले आते हैं लेकिन इस वक्त सत्ता को तरस रहीं हैं बहन जी। कभी आंध्र प्रदेश के हैदराबाद को सिलिकॉन वैली बनाने वाले तेलगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू का आज  लोग नाम भूलने लगे। आज की कांग्रेस की रैली में उमड़ी भीड़ को जीत का पैमाना मान लेना जरा जल्दी होगी। मैंने गांवों से बड़े शहरों में होने वाली रैलियां और उसमें जाने वालों की भीड़ देखी है। यकीन मानिए आधे से ज्यादा लोग बड़े शहरों के  रकाब तकाब देखने के जाते हैं। बहुत बड़ी तो नहीं लेकिन छोटी सी राजनैतिक पृष्ठभूमि होने के नाते मैंने देखा हैं अपने गांव से लखनऊ में होने वाली तमाम रैलियों में जाने वालों को। हर बार लोग वहीं होते हैं। बस अंतर सिर्फ हाथो में पकड़े गए झंडे और बैनर का होता है।
आमीन...

Saturday, October 20, 2012

...जो लौट के घर न आए

घर से तार पहुंचा था। पता चला कि सूबेदार सुरिन्दर विर्क के  बेटा हुआ है। विर्क तो मारे खुशी के बल्लियों उछल रहा था। खाना भी शायद ढंग से नहीं खाया था। अपनी बीबी हरप्रीत की फोटो को चांदी सी बिछी बर्फ पर लेटकर खूब चूमा था उसनें। मैं भी वहीं था। विर्क ने कहा...ओए...ढिल्लो..तू ताया बन गया है...ताया...। मुझे गले से लगाया और बर्फ पर गिरा दिया। फिर मेरा हाथ पकड़ कर बैठ गया। चंद सेकेंड की खामोशी के बाद ही एक सिसकती हुई आवाज के साथ विर्क के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मैंने पूछा ओए...विर्क...ये क्या...तू रो रहा है...अरे आज तो जश्न की रात है। विर्क कुछ नहीं बोला। फिर मेरे कंधे को बहुत ही तेजी से पकड़ कर बोला...ढिल्लो...पता नहीं मैं अपने बेटे को देख पाऊंगा भी या नहीं...मैंने तुरंत ही उसका मुंह दबाते हुए कहा...ऐसा न बोल। चंद रोज में जंग खत्म हो जाएगा। हम सब वापस अपने घर चलेंगे। फिर तूं अपने गांव में एक अच्छी सी पार्टी देना। मेरी बातों को सुनकर विर्क हंसा और बोला...ढिल्लो तुझे तो पता ही है क्या हालात हैं। हमारी ब्रिगेड के कई जवान चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो चुके हैं। उसने नाम बताया...वो...वो...सुखबीर...याद है...चार महीने पहले ही तो शादी हुई थी उसकी...चीनियों ने मार दिया। उसकी बीबी को तो पता भी नहीं होगा शायद। बस इसी का डर है...क्या होगा मेरी बीबी और बच्चे का...मैने कहा तू फिक्र न कर...भारत सरकार ने पंजाब और राजस्थान से कुछ और सेना की टुकडिय़ों को इस इलाके में भेज दिया है। हम लोग ज्यादा हो जाएंगे और चीनियों को मार भगाएंगे। लेकिन उसके दिल में न जाने कैसी उलझन हो रही थी...बोला...पता नहीं मेरा बेटा कैसा होगा...मुझ पर गया होगा या प्रीत पर...। बस जल्दी से युद्ध खत्म हो और मैं अपने घर जाऊं...अपने काके को देखने का बहुत जी कर रहा है।  मंैने उसे बहुत समझाया।
आधी रात बीत चुकी थी। संदेश मिला कि सेलापास के आगे डोएनारा इलाके में चीनी सैनिकों ने फिर से हमला कर दिया। आप लोग फौरन मोर्चा संभालो। मैं तो वायरलेस पर था ही। विर्क  अवनी ब्रिगेड के साथ मोर्चे पर पहुंच गया। युद्ध हुआ। ब्रिगेड के ज्यादातर लोग मारे गए। विर्क भी उनमें से एक था।
आज पचास साल हो गए हैं इस बात को। विर्क का बेटा भी पचास साल का हो गया है। अब कनाडा में सेटल है।  कभी कभार ही आता है इंडिया। सुना है कोई बड़ा बिजनेस करता है। मेरी उम्र भी ८३ साल के करीब है। सुना है कि विर्क की शहादत की खबर उसकी पत्नी नहीं बर्दाश्त कर पाई थी। कुछ दिन बाद ही चल बसी थी। उसके बेटे को उसकी मासी ने पाला था। जो बाद में उसको लेकर कनाडा चली गई थी। १९६२ में हुए भारत-चीन के युद्ध की बातें आज भी जख्मों को हरा कर देती हैं। अगर हमारी सरकार पहले से मुस्तैद होती तो शायद विर्क और उसके जैसे अनगिनत शहीद हुए जवान अपने परिवार को खुशियां दे रहे होते।
(१९६२ में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर ढिल्लो तवांग इलाके में तैनात थे। उनसे बातचीत पर आधारित )