Sunday, October 8, 2017

...और चांद अंगड़ाई लेता हुआ निकल आया

(चौदह साल हो गए इसको :)
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ये बात 2003 की है। भोर के पांच बज रहे थे। और मेरी ट्रेन कालका स्टेशन पर पहुंच रही थी। हम तकरीबन चालीस लोग थे। सभी स्नातक अंतिम वर्ष के भूगोल के छात्र थे। स्टडी टूर पर हिमाचल प्रदेश जाना था। सो श्मिला के लिए कालका से ट्वाय ट्रेन पकडऩी थी। एक अजब सा उल्लास था। होता भी क्यों न। इतने सारे दोस्तों के साथ पहली बार घूमने जो निकले थे।सभी साथी स्टेशन पर खड़ी छोटी ट्रेन में सवार हुए। तकरीबन साढ़े आठ बजे टे्रन एक लंबी सीटी के साथ चल पड़ी। और शुरू हुआ ऐसा सफर जो आज तक नहीं भूला, न ही कभी भूल पाऊंगा। सब कुछ नया नया सा था। ये बात दीगर है जो वादियां, नजारे, गांव, शहर, टे्रनें, लोग और बोलचाल 2003 में एकदम अलग और नई सी लग रही थी वह 2006 से अपनी सी लगने लगी थी। क्योंकि मेरी किस्मत मुझे चंडीगढ़ में जुनून के लिए खींच चलाई थी। मैं बताता चलूं कि पत्रकारिता मेरा जुनून ही है। खैर...ट्रेन में मैंं अपने दोस्तों के साथ बैठा था। उनमें कुछ लड़के थे और कुछ लड़कियां। मस्ती हो रही थी। मेरे सामने वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला भी बैठीं थी। उनके साथ में यही कोई आठ दस साल का शायद उनका पोता रहा होगा वह भी बैठा था। वह दादी हम लोगों की शैतानियों को देखती और फिर मुस्कुराने लगती। वैसे तो शिमला तक का अमूमन सफर इस ट्रेन से पांच घंटे का होता है। चूंकि ये हम लोगों का पहला सफर था शायद इसीलिए बहुत लंबा हो गया। ट्वॉय ट्रेन कालका से चलकर इस रूट पर पडऩे वाले सनवारा स्टेशन पर जाकर रुक गई। समय यही कोई उस वक्त साढ़े दस बजे का रहा होगा। ट्रेन कछ देर तक नहीं चली। जानकारी लेने के बाद पता चला कि ट्रेन का इंजन खराब हो गया है। शिमला से दूसरा इंजन आएगा तभी ट्रेन चलेगी। हम लोगों ने कहा कि चलो...बहुत ही अच्छा है। पहाड़ों के बीच रुककर खूब मस्ती करेंगे। हम लोगों ने की भी खूब मस्ती। छह घंटे गुजर गए यानीकि साढ़े चार बजने को हो गए। तब तक इंजन नहीं आया था। अक्टूबर का महीना था सो हल्की सी ठंड भी होने लगी थी। कुछ समय बाद इंजन भी आ गया और ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी। उसी सीट पर मैं जाकर बैठ गया जहां पर पहले बैठा था। सामने वहीं दादी बैठी हुई थी। उनके पास कुछ सामान था। वह बार बार अपने पास रखे सामान को सहेज लेती थी क्योंकि ट्रेन के हिलने डुलने पर वह इधर उधर हो जाता था। मैने उनसे पूछा कि दादी अगर इसमें कुछ टूटने वाला सामान हो तो मेरी सीट पर रख दीजिए मैं संभाल लूंगा। तो उन्होंने कहा कि बेटा...कुछ टूटने वाला नहीं है। इसमें तो मेरी बेटी की करवा चौथ की होने वाली पूजा का सामान है। जो कि मुझे उसके घर पर देना है। मेरी बेटी का पहला करवा चौथ है। पूजा का सामान मां के घर से ही जाता है। सो मैं लेके जा रही है। मैने उनकी बात को सुनकर सिर्फ अच्छा कह कर बाते करने मे लग गया। शाम के सात बज रहे थे। हम लोगों की ट्रेन शिमला नहीं पहुंची थी। पता चला कि अभी पहुंचते हुए एक से सवा घंटा और लग जाएगा। दादी ने भी पूछा कि बेटा कितना समय और लगेगा तो मैने बताया सवा घंटे। इतना सुनकर उन्होंने ट्रेन से बाहर की ओर झांका। पहाडों को अंधेरे ने अपने आगोश में ले लिया था। कोई गांव आता था तो उसकी लाइटें ही टिमटिमाती हुई नजर आती थी। वह बार बार कुछ खास देखने की कोशिश कर रहीं थी। मैने फिर उनसे कहा कि हम लोग हैं आपके साथ इसलिए रात को परेशान होने की जरूरत नहीं है। तो उन्होंने बताया कि...बेटा मैं अपने लिए परेशान नहीं हो रही हूं...मैं तो अपनी उस बेटी के लिए परेशान हूं...जिसका आज पहला करवा चौथ का व्रत है...पौर पूजा का सारा सामान मेेरे पास है। चांद निकलने को है...पता नहीं कैसे होगी मेरी बेटी की पूजा...बस मैं यही बार बार देख रही हूं कि कहीं चांद तो नहीं निकल आया। उनका इतना सुनना वहां मौजूद सभी लोग ने बाहर से चांद को देखने की कोशिश की और कहा कि दादी अभी चांद नहीं निकला है। ट्रेन तकरीबन सवा आठ बजे शिमला स्टेशन पर पहुंची। ठंड मानों शरीर को चीर रही हो। हम सभी लोग ट्रेन से उतरे। अपने सामान के साथ उन दादी का सामान भी स्टेशन पर उतार कर बाहर लेकर आए। एक बार फिर से आसमान की ओर देखा तो चांद नहीं निकला था...उनका दामाद दादी को लेने स्टेशन पर आया था। उससे परिचय भी हुआ...दादी अपनी बेटी के घर की ओर चल पड़ी...और हम लोग अपनी उस ठिकाने की ओर जहां पर रात बसर करनी थी...मेरा होटल थोड़ा ऊंचाई पर था...ऊपर चढ़ ही रहा था तो देखा कि आसमान में पूरब दिशा से हल्की सी रोशनी हो रही है....ये रोशनी उस अंगड़ाई लेते हुए चांद की थी जो आज अनगिनत सुहागिनों को दीदार कराने के लिए निकल चुका था...चांद को देखकर बस दिल में एक ही बात रह रह कर कौंध रही थी कि पता नहींं वह दादी कहां तक पहुंची होंगी...घर पहुंच गईं होंगी या उनको भी हमारी तरह हल्की सी रोशनी के साथ चांद निकलता हुआ दिखा होगा......।आज इस घटना को छह बरस होने को हैं। मैं अब अक्सर उन्ही राहों से गुजरता हूं...जहां पर छह साल पहले जाते हुए कुछ एक दादी की व्यथा को महसूस किया था....तो बरबस ही वो बूढ़ी दादी का चेहरा सामने आ जाता है और रह रह कर सिर्फ यही सोंचने को मजबूर हो जाता हूं कि...उनकी बेटी की पहली करवा चौथ की पूजा कैसे हुई होगी....चांद को देखकर या..........................!

Sunday, April 30, 2017

...लद्दाख की भूरी पहाड़ियों पर जब चांद निकला


अब शाम ढलने लगी थी। लद्दाख की भूरी पहाड़ियों पर अंधेरा छाने को था। इसी के साथ ठंड भी बढ़ने लगी थी और हमारी बस का ड्राइवर न जाने कहां गुम था। एक एक करके हेमिस मॉनेस्ट्री से गाड़ियां निकलने लगी। अकबर और रजनी से गुजारिश की कि…भई…अब तुम लोग ही जाओ और बस ड्राइवर को ढूंढ कर लाओ। भगवान जाने कैसे इतनी भीड़ में मंगोलियन शक्ल वाला एक आदमी दोनों जने ले आए। अकबर बोला…ले आए ड्राइवर को। चलो भई बस में चढ़ जाओ। ज्यादातर लोग तो बस के अंदर चढ़े लेकिन कोलकाता के अनिर्बान, पटना के सुमित और बंगलूरू के सुदर्शन समेत कुछ और लोग बस की छत पर चढ़ गए।

बस अब हिचकोले खाती हुई काली सड़क पर लेह शहर की ओर दौड़ी जा रही थी। सड़क के साथ साथ नीचे की ओर बह रही इंडस रिवर और उसके पीछे पहाड़ियों में सूरज के अस्त होने की लालिमा का जो संगम था वह देखते ही बनता था। मेरे आगे वाली सीट पर शायदा जी थी।  शायदा जी इंडस नदी की उपयोगिता पर प्रकाश डालती रहीं और हममें से ज्यादातर लोग उनके ज्ञान का अर्जन करते रहे। तभी बस की छत से तेज आवाजे आने लगी। हम लोग डर गए न जाने क्या हुआ। बस रोकी गई तो पता चला जो साथी बस की छत पर लद्दाख को एंज्वॉय कर रहे थे वह जीरो डिग्री के करीब पहुंचने वाले पारे में कड़कड़ाने लगे थे और नीचे आने के लिए बेताब थे। सभी लोगों की ठंड के चलते पूरी तरह से बैंड बज चुकी थी। अब सब बस के अंदर थे और एक साथ आवाज उठी कि कहीं पर चाय पी जाए।
कुछ देर में हम लोग एक वीराने इलाके में बहुत ही छोटी सी चाय की दुकान पर थे। दुकान में घुसते ही मैगी से लेकर चिप्स और चाय पर हमला शुरू हुआ जो करीब आधे घंटे तक चला। चाय पीते पीते ही पता चला कि जो शख्स चाय बना रहे थे वो लद्दाखी सिनेमा के स्टार हैं। कई सिनेमा में काम कर चुके हैं। उनकी कई फिल्मों के तो पोस्टर भी उनकी दुकान में लगे थे। फिल्मी दुकानदार से बात हो रही ही थी कि पीछे से एक तेज अवाज आई…बाहर नहीं निकलेगा क्या तुम लोग…अरे उधर भी तो देखेगा…ये आवाज राहुल की थी। वो करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई से निकलने वाले चांद को दिखाने को बेताब था। एक पहाड़ी की ओट में सूरज सी रोशनी के साथ लखनऊ की धरती से दिखने वाले चांद की तुलना में कई गुना बड़ा चांद निकल रहा था। ये वास्तव में एक अद्भुत नजारा था। मैंने ऐसा ही एक बार चांद लगभग इतनी ही ऊंचाई से सिक्किम के नाथूला में निकलते देखा था। इतनी ऊंचाई से चांद को देखना और देखते रहना निश्चित ही सबके लिए एक अनोखा अनुभव था।
तभी एक आवाज आई कि चलो भई…लेह भी पहुंचना है। कल की भी कुछ तैयारी की जाए। अब सवाल था कि कल दोबारा हेमिस जाया जाए या फिर पैंगॉंग लेक। माइनस डिग्री के सत्रह हजार फीट पर बने चांगला पास को पार करते हुए करीब 14 हजार फीट की ऊंचाई पर नीले पानी की दुनिया की सबसे खूबसूरत सी झील पर कौन नहीं पहुंचना चाहेगा। ज्यादातर लोगों ने हां की। बस फिर क्या था। बस में ही तैयारी शुरू हुई पैंगॉंग लेक पर जाने की। बजट…यही मुद्दा था। कितना रुपया लगेगा और उसको बस में इकट्ठा कौन करेगा। सर्वसम्मति से एकध्वनि में आशीष तिवारी यानीकि मैं, मेरा नाम पास हो गया कि मैं कंडक्टर बनकर सबसे रुपये कलेक्ट करूं और फिर उसी रात को अगली सुबह के लिए टैक्सी का इंतजाम करूं। बस फिर क्या था। यूपी की सरकारी बसों में खूब सफर किया है मैंने। कान पर चढ़ाया पेन और हाथ में लिया कागज…इकट्ठे होने लगे रुपये। चंद मिनट में तकरीबन 24 हजार रुपया हाथ् में।
इधर हम लोगों के पैंगॉंग लेक पर जाने की तैयारियां हो रहीं थी वहीं बस में तीन लोग और भी थे जो हमारे ग्रुप से नहीं थे और शायद जल्दी में थे उनको देर हो रही थी। हम लोग मस्ती के मूड में थे। गाना बजाना खाना पीना करते हुए रुकते रुकाते चल रहे थे। आखिरकार लेह शहर में जब एक बार बस और रुकी तो जो उन लोगों के सब्र का बांध टूट ही गया। बड़ा नाराज हुए वो। मुझसे भी। खूबसूरत सी शाम और मनमोहक नजारों के साथ कट रही शाम में तीखी नोझोंक में मजा थोड़ा किरकिरा तो हुआ लेकिन मामला जैसे तैसे रफा दफा हो गया।
खैर, रात के नौ बजने वाले थे। लेह शहर का एक तबका तो शायद नींद में था लेकिन मुख्य सड़कों की बाजारें कुछ हद तक गुलजार थीं। सामने एक टैक्सी वाले का बोर्ड देखकर मैं और अकबर वहां पहुंचे। उसने पैंगॉंग लेक तक दो ट्रैवलर का जितना किराया बताया वो बहुत ज्यादा था। टैक्सी वाले का नाम दानिश खान था। अकबर भाई ने तुरंत टांका भिंड़ाया और खुद को अकबर खान टाइपस जैसा बताते हुए सौदा पटा लिया। एडवांस दिया गया और सुबह पांच बजे दो गाड़ियों को हम लोगों के होटेल्स में


भेजेन को कहा गया।
बस वाले ने भी हम लोगों को उतारा तो कुछ लोग होटेल्स् तो कुछ दवा की दुकानों की ओर भागे। किसी को ऑक्सीजन सिलेंडर चाहिए था इतनी ऊंचाई पर जाने के लिए तो किसी को कुछ और दवाएं। कुछ को सिलेंडर मिले तो कुछ ने हिम्मत दिखाते हुए नहीं लिए। 14 हजार फीट की ऊंचाई पर बनी पैंगॉंग लेक पर ऑक्सीजन बहुत कम होती है। खास बात यह है कि लेक तक पहुंचने के लिए दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर में से एक चांगला पास होते हुए ही जाना होता है। जो तकरीबन सत्रह हजार फीट की ऊंचाई पर हैं। लोग वहां रुकते हैं पारा अक्सर ही माइनस में रहता है। सार्दियों में तो यहां पर पारा माइनस तीस डिग्री तक पर पहुंच जाता है।
फिलहाल थोड़ी देर में सभी लोग अपने अपने होटेल्स पहुंचे। रास्ते में लखनऊ के नंबर वाली मारुती 800 एक कार को देखकर अकबर भाई थोड़ा इमोशनल हो गए कि यार लद्दाख में भी लखनऊ की कार। थोड़ा प्राउड भी हुआ कि लखनउव्वे कहीं भी पहुंच जाते हैं...

क्रमश…



Wednesday, March 29, 2017

Thursday, October 6, 2016

नीले आकाश, सुनहरे पहाड़ और सपनों सा हसीन...लद्दाख 
हाय...आइ एम अकबर...बेसिकली फ्रॉम लखनऊ...
अच्छा...अकबर दि ग्रेट फ्रॉम लखनऊ...गुड...आप तो मेरे साथ सफर करेंगे। तभी पीछे से आवाज आई...आशीष...अकबर साहब तो कल से पागल ही हुए जा रहे थे कि...मेरे लखनऊ से कौन आ रहा है... कई बार पूछा...एयरपोर्ट पर जब आप नहीं मिले तो सोचा बोर्डिंग में ही मिल लेंगे। लो जी मिल लो...इतना कहते हुए शमिता ने कहा...हॉय आई एम शमिता...शी इज पूर्णिमा एंड शी इज रजनी...और भ्मी बहुत सारे लोग हैं। जो सुबह पांच बजे की फ्लाईट से लेह पहुंच चुके हैं। अब हम सब कुछ दिन लेह में एक साथ गुजारेंगे। सुबह आठ बजकर पचास मिनट पर दिल्ली से उड़े थे। दस बज रहे थे तभी जहाज में अनाउंस हुआ कि लेह एयरपोर्ट पर सेना के जहाजों की उड़ान हो रही है। थोड़ा वक्त लगेगा।
बंजर से भूरे रंग के पहाड़ों की चोटियां। बादलों की ओट में कभी छुप रहीं थी तो कभी सामने आने लगी। तभी फिर अनाउंस हुआ कि अब हम कुछ मिनट में लेह एयरपोर्ट पर लैंड करेंगे। बाहर का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस है। समुद्र तल से साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर होने की वजह से लेह में ऑक्सीजन की मात्रा कम है। इसलिए आप लोगों को सलाह दी जाती है कि अपने शरीर को यहां के वातावरण के अनुकूल करने लिए कम से कम 24 घंटे आराम करने दें। पानी और लिक्विड डाइड ज्यादा से ज्यादा लें। हैपपी स्टे इन लद्दाख...इतना सुनते सुनते जहाज लैंड कर चुका था।
यह मेरी लेह की दूसरी विजिट थी। पहली विजिट महज कुछ घंटों की ही थी। जब 2010 में लेह में हुए क्लाउड बर्स्ट के दौरान सीआईआई और सेना ने यहां के गांवों को बसाया था और दिखाने के लिए लाए थे। स्वेटर से लेकर जैकेट तक बाहर आ चुके थे हालांकि पहनने की जरूरत नहीं पड़ी। लेकिन जहाज के कैप्टन के इंस्ट्रक्शन जरूर कानों में सुनाई पड़ रहे थे...अधिक ऊंचाई के चलते सांस लेने में दिक्क्त हो सकती है। लोकल हॉस्पिटल से लेकर सेना के अस्पताल में तक में आप एडवाइस ले सकते हैं आदि आदि।
एयरपोर्ट के बाहर पहुंचते ही सामने दिखते बेइंतहां खूबसूरत शांति स्तूपा की चमक आपको एक अलग दुनिया का अहसास कराती है। सूरज की रोशनी से नहाए हुए भूरे और गोल्डेन कलर के पहाड़ और उनके पीछे एकदम नीले रंग का आसमान मानों लगता हो कोई कैनवास पर उकेरी गई तस्वीर बनी हो। लेह लद्दाख एक ऐसा इलाका है जहां हर वक्त यह महसूस कर सकते हैं कि नीले हो चले आकाश को आप कभी भी छू सकते हो।
नीले आकाश और सुनहरे पहाड़ों में खोया हुआ ही था कि...पीछे से आवाज आई...अबे आशीष...तू अभी भी वैसा है या कुछ बदल गया है...मैंने पीछे मुड़कर देखा तो शायदा जी अपने बैग खींचते हुए और मुझसे यह पूछते हुए आगे बढ़ी चली आ रहीं थी। मैंने भी मुस्कराते हुए उनका इस्तकबाल किया और कहा... कुछ दिन आप साथ रहेंगी...पता ही चल जाएगा बदला हूं या नहीं। शायदा जी को मैं पिछले करीब ग्यारह सालों से जानता हूं। चंडीगढ़ में मैंने उनके साथ काम किया। हालांकि लेह में उनसे मुलाकात तकरीबन छह साल बाद हुई। शायदा जी को सांस लेने में तकलीफ होने लगी थी। लेकिन कुछ समय में उनको राहत मिली लेकिन गेस्ट हाऊस पहुंंच कर।
करीब बीस मिनट की दूरी तय करने के बाद हम लोग एक खूबसूरत से एक घर नुमा गेस्ट हाऊस 'मांग्यूल' पहुंच चुके थे। चारों ओर खूबसूरत से पहाड़ों के बीच में बना यह बेइंतहा खूबसूरत गेस्ट हाऊस और उससे भी प्यारा उसका केयर टेकर। चंद मिनट में हम लोगों को अपने अपने कमरे दिखाकर दौड़कर चाय ले आया। उसने भी सलाह दी कि अब आप लोग सो लें तो ज्यादा बेहतर होगा। दोपहर के बारह बज रहे थे। जैसे ही लेटे चंद मिनट में नींद ने अपने आगोश में ले लिया। करीब तीन घंटे बाद राहुल की एक भारी भरकम आवाज आई...अरे उठना नहीं है क्या...खाना वाना भी तो खाना है। चल उठ जा...दादा राहुल दत्ता काेलकाता से हैं। दिल्ली गेस्ट हाऊस से लेकर लेह तक में मेरे रूम पार्टनर भी :) जैसे तैसे उठे तो शरीर एकदम सा हल्का। हालांकि सोते वक्त जरूर मुझे भी सांस लेने में कठिनाई हुई लेकिन धीरे धीरे सब नॉर्मल होने लगा।
रअब हम लाग मेन मार्केट निकल चुके थे। मिट्टी की सड़कें। मिट्टी की दीवारें। आप कितना भी साफ सुधरे बनकर निकलें हो एक बार तो आपके जूतों से लेकर कपड़ों तक में धूल भर ही जानी है। मुझे बताया गया कि यहां पर बारिश नहीं होती है। यही वजह है कि अभी भी बहुत से पुराने घरों में या यूं कह लें ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने हैं। खैर...हम लोग एक रेस्ट्रांट पहुंचे। शायद वो लेह के अच्छे रेस्ट्रांट में रहा होगा। लेह में कोई भी नामी होटेल आैर कोई भी फेमस रेस्ट्रांट चेन नहीं है। करीब दो घंटे यहां बिताकर हम लोग फिर वापस अपने गेस्ट हाऊस को चल पड़े। क्योंकि शरीर को बेवजह थकाना नहीं था।
रात को जल्दी सोना भी था क्योंकि अगली सुबह लद्दाख के सबसे पुराने वंश द्रुपका लीनेज की हेमिस मॉनेस्ट्री भी जाना था। जो शहर से पचास किलोमीटर दूर और लेह शहर से ज्यादा ऊंचाई पर थी।
क्रमश...

Thursday, September 22, 2016

...लो चांद निकल आया

भोर के पांच बज रहे थे। और मेरी ट्रेन कालका स्टेशन पर पहुंच रही थी। हम तकरीबन चालीस लोग थे। सभी स्नातक अंतिम वर्ष के भूगोल के छात्र थे। स्टडी टूर पर हिमाचल प्रदेश जाना था। सो श्मिला के लिए कालका से ट्वाय ट्रेन पकडऩी थी। एक अजब सा उल्लास था। होता भी क्यों न। इतने सारे दोस्तों के साथ पहली बार घूमने जो निकले थे।सभी साथी स्टेशन पर खड़ी छोटी ट्रेन में सवार हुए। तकरीबन साढ़े आठ बजे टे्रन एक लंबी सीटी के साथ चल पड़ी। और शुरू हुआ ऐसा सफर जो आज तक नहीं भूला, न ही कभी भूल पाऊंगा।
खैर...ट्रेन में मैंं अपने दोस्तों के साथ बैठा था। उनमें कुछ लड़के थे और कुछ लड़कियां। मस्ती हो रही थी। मेरे सामने वाली सीट पर एक बुजुर्ग महिला भी बैठीं थी। उनके साथ में यही कोई आठ दस साल का शायद उनका पोता रहा होगा वह भी बैठा था। वह दादी हम लोगों की शैतानियों को देखती और फिर मुस्कुराने लगती। वैसे तो शिमला तक का अमूमन सफर इस ट्रेन से पांच घंटे का होता है। चूंकि ये हम लोगों का पहला सफर था शायद इसीलिए बहुत लंबा हो गया।
ट्वॉय ट्रेन कालका से चलकर इस रूट पर पडऩे वाले सनवारा स्टेशन पर जाकर रुक गई। समय यही कोई उस वक्त साढ़े दस बजे का रहा होगा। ट्रेन कछ देर तक नहीं चली। जानकारी लेने के बाद पता चला कि ट्रेन का इंजन खराब हो गया है। शिमला से दूसरा इंजन आएगा तभी ट्रेन चलेगी। हम लोगों ने कहा कि चलो...बहुत ही अच्छा है। पहाड़ों के बीच रुककर खूब मस्ती करेंगे। हम लोगों ने की भी खूब मस्ती। छह घंटे गुजर गए यानीकि साढ़े चार बजने को हो गए। तब तक इंजन नहीं आया था।
अक्टूबर का महीना था सो हल्की सी ठंड भी होने लगी थी। कुछ समय बाद इंजन भी आ गया और ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी। उसी सीट पर मैं जाकर बैठ गया जहां पर पहले बैठा था। सामने वहीं दादी बैठी हुई थी। उनके पास कुछ सामान था। वह बार बार अपने पास रखे सामान को सहेज लेती थी क्योंकि ट्रेन के हिलने डुलने पर वह इधर उधर हो जाता था। मैने उनसे पूछा कि दादी अगर इसमें कुछ टूटने वाला सामान हो तो मेरी सीट पर रख दीजिए मैं संभाल लूंगा। तो उन्होंने कहा कि बेटा...कुछ टूटने वाला नहीं है। इसमें तो मेरी बेटी की करवा चौथ की होने वाली पूजा का सामान है। जो कि मुझे उसके घर पर देना है। मेरी बेटी का पहला करवा चौथ है। पूजा का सामान मां के घर से ही जाता है। सो मैं लेके जा रही है। मैने उनकी बात को सुनकर सिर्फ अच्छा कह कर बाते करने मे लग गया। शाम के सात बज रहे थे। हम लोगों की ट्रेन शिमला नहीं पहुंची थी। पता चला कि अभी पहुंचते हुए एक से सवा घंटा और लग जाएगा। दादी ने भी पूछा कि बेटा कितना समय और लगेगा तो मैने बताया सवा घंटे। इतना सुनकर उन्होंने ट्रेन से बाहर की ओर झांका।
पहाडों को अंधेरे ने अपने आगोश में ले लिया था। कोई गांव आता था तो उसकी लाइटें ही टिमटिमाती हुई नजर आती थी। वह बार बार कुछ खास देखने की कोशिश कर रहीं थी। मैने फिर उनसे कहा कि हम लोग हैं आपके साथ इसलिए रात को परेशान होने की जरूरत नहीं है। तो उन्होंने बताया कि...बेटा मैं अपने लिए परेशान नहीं हो रही हूं...मैं तो अपनी उस बेटी के लिए परेशान हूं...जिसका आज पहला करवा चौथ का व्रत है...पौर पूजा का सारा सामान मेेरे पास है। चांद निकलने को है...पता नहीं कैसे होगी मेरी बेटी की पूजा...बस मैं यही बार बार देख रही हूं कि कहीं चांद तो नहीं निकल आया। उनका इतना सुनना वहां मौजूद सभी लोग ने बाहर से चांद को देखने की कोशिश की और कहा कि दादी अभी चांद नहीं निकला है।
ट्रेन तकरीबन सवा आठ बजे शिमला स्टेशन पर पहुंची। ठंड मानों शरीर को चीर रही हो। हम सभी लोग ट्रेन से उतरे। अपने सामान के साथ उन दादी का सामान भी स्टेशन पर उतार कर बाहर लेकर आए। एक बार फिर से आसमान की ओर देखा तो चांद नहीं निकला था...उनका दामाद दादी को लेने स्टेशन पर आया था। उससे परिचय भी हुआ...दादी अपनी बेटी के घर की ओर चल पड़ी...और हम लोग अपनी उस ठिकाने की ओर जहां पर रात बसर करनी थी...
मेरा होटल थोड़ा ऊंचाई पर था...ऊपर चढ़ ही रहा था तो देखा कि आसमान में पूरब दिशा से हल्की सी रोशनी हो रही है....ये रोशनी उस अंगड़ाई लेते हुए चांद की थी जो आज अनगिनत सुहागिनों को दीदार कराने के लिए निकल चुका था...चांद को देखकर बस दिल में एक ही बात रह रह कर कौंध रही थी कि पता नहींं वह दादी कहां तक पहुंची होंगी...घर पहुंच गईं होंगी या उनको भी हमारी तरह हल्की सी रोशनी के साथ चांद निकलता हुआ दिखा होगा...

Tuesday, March 15, 2016

हे माननीय 'बाहुबली घोड़ामार विधायक' सर...आपको शत शत नमन

आपकी तस्वीरें देखी। आपकी फड़कती हुई भुजाएं देखी। हाथ में दंड लेकर आपने जिस पौरुषत्व का प्रदर्शन किया। ऐसा निश्चित रूप से सिर्फ किसी 'वीर की भुजाएं' ही कर सकती है। मुझे गर्व है आप पर 'बाहुबली जी'।
मैंने बचपन से लेकर आज तक घोड़े के बारे में जब जब सुना तब तक महाराणाप्रताप का वो 'चेतक' ही याद आता था। लेकिन 'बाहुबली जी' आपने तो कमाल कर दिया। ऐसे चेतकों को छठी का दूध याद दिला दिया। यकीन मानिए 'बाहुबली सर' निश्चित रूप से आप जैसाा योद्धा अगर उन दिनों होता तो चेतक कब का मैदान छोड़ कर भाग जाता। नहीं भागता तो आप उसको भागने लायक ही नहीं छोड़ते।
आपने बहुत सही किया जो घोड़े को जमकर हौका। टांगे टूट गई तो टूट जाने दो।
पता नहीं बाहुबली सर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि घोड़ा साला असहिष्णु ही रहा होगा...वरना आपा जैसा 'सहिष्णु नेता' भला कहीं ऐसा करता। और सर... हो सकता है घोड़ा देशद्रोही भी हो। सहीं किया सर आपने। वैसे क्या कहा था घोड़े ने आपको ? क्योंकि इतना बलशााली शरीर पराक्रम के लिए यूं ही उतावला नहीं होता।
खैर...बाहुबली सर मुझे यकीन है आप की भुजाएं फड़क रहीं होगी। कस कस कर फड़क रहीं होगी। बार्डर के उस पार जो घोड़े रोज हमारी सरहदों की ओर देखकर
कांबिंग करते हैं उनको सबक सिखाने के लिए सर। सर एक दिन हो जाएं उधर भी दो दो हाथ। सर...आपको तो निश्चित रूप से अब तक 'घोड़ामार विधायक' की उपाधि मिल गई होगी।
आप महान हैं सर। हमारे देश को आप जैसे ही 'घोड़ामार विधायक' की बहुत जरूरत है।
--------------------------यह कविता तो बस यूं ही-------------------------
रण बीच चौकड़ी भर-भर करचेतक बन गया निराला था
राणाप्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था
जो तनिक हवा से बाग हिली लेकर सवार उड जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड जाता था'''
गिरता न कभी चेतक तन पर राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर वह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहीं वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं किस अरि मस्तक पर कहाँ नहीं
निर्भीक गया वह ढालों में सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में बढते नद सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया बिकराल बज्रमय बादल सा
अरि की सेना पर घहर गया। भाला गिर गया गिरा निशंग
हय टापों से खन गया अंग बैरी समाज रह गया दंग घोड़े का ऐसा देख रंग

Tuesday, April 21, 2015

...हां...हां...वो मैदान ही है...अमृत


अमृत...तुम पहाड़ से नीचे गए हो कभी। हां...शाब...गया है न। नीचे गया है। बागडोगरा जाता रहता है। शाब लोग मेम शाब लोग आता है न। उनको एयरपोर्ट लेने जाता है। कभी न्यूजलपाई गुड़ी भी हो आता है। हम्म्म्म्म...शादी मना लिया है क्या तुमने अमृत। हां हां शाब...एक बेटी है मेरा। इंटर क्लास में है शाब। मुझे देखकर लगता नहीं है न शाब कि मैं शादीशुदा है...इतना कहते हुए अमृत मुस्कराने लगा। और मैं उसकी टाटा सूमों गाड़ी में अगली सीट पर बैठे कर ऐसे ही बाते करते हुए टाइम पास करने लगा।
इस बातचीत को दो साल होने को हैं। मैं चंडीगढ़ से लखनऊ आ गया और अमृत अभी भी उन्हीं सिक्किम की पहाड़ी वादियों में लोगों को घुमाता फिराता है।
आज मेरा वीकली ऑफ था। सो शाम को फैमिली के साथ कहीं निकला था। रास्ते में अचानक एक कॉल आई। जब तक उठाता तब तक फोन कट गया। दोबारा फिर कॉल आई और उठाने पर एक अंजानी सी आवाज आई...हेलो...आशीष शाब बोल रहे हैं...जवाब हां में दिया तो उधर से फिर से आई आवाज ने मेरी आंखें नम कर दी। वो आवाज मेरे दिल में घर करती चली गई और मैं गाड़ी को किनारे लगाकर आंखे नम करता। ये अमृत था। अमृत क्षेत्री। सिक्किम से। आज अमृत की बेटी दीक्षा की शादी है।
अमृत से मेरा कोई पुराना संबंध नहीं है। दो साल से ही जानता हूं उसको। लेकिन यह जान पहचान एक घर के किसी सदस्य और बेहद करीबी सी है। मैं दो साल पहले सिक्किम टूर गया था तो मेरी गाड़ी का ड्राइवर अमृत ही था। करीब बारह दिनों के इस टूर में ऐसा कुछ हुआ कि अमृत और उसके परिवार से बहुत नजदीकियां हो गई। दरअसल हआ ये कि एक दिन हम लोगोें को कहीं जाना था और अमृत गाड़ी लेकर नहीं आया। अमृत के न आने का कारण जब पता चला तो मैं अपना प्रोग्राम पोस्टपोन करके उसके घर चला गया। उस दिन उसकी शुगर बहुत बढ़ बई थी। अमृत को कई सालों से डाइबिटीज थी। घर वालों के लाख कहने के बाद भी वह इलाज नहीं ले रहा था। इस बात को लेकर उसके घर वाले डरे रहते थे कि कहीं अमृत को कुछ हो गया तो उनकी पूरी दुनिया ही उजड़ जाएगी। पता नहीं अमृत को क्या लगा कि उसने मेरा कहा मान कर अपनी सारी जांचे करवाई। उसकी शुगर हायर लेवल तक बढ़ी थी। मैंने अपने एक डॉक्टर दोस्त से चंडीगढ़ पीजीआई में सारी रिपोर्ट मेल से भिजवा कर दिखलाई। मामला रिस्की हो चुका था। कई आर्गन पर असर पड़ना शुरू हो गया था। लेकिन उसको कुछ मेडिसिन दी गई। वो डॉक्टर की एडवाइस पर दवा लेता रहा है और मैं अपने टूर के आखिरी पांच दिनों तक रोजाना उसको देखने जाता था। एक अटूट सा रिश्ता हो गया था। नार्थ सिक्किम जिले के एक बियावान इलाके में उसका गांव था। जहां पर अमूमन छह महीने से ज्यादा दिनों तक बर्फ जमी रहती है। गर्मियों में वह सिक्किम शहर में आ जाता है। बाकी के दिनों में अपने बूढ़े मांप के साथ वापस गांव में चला जाता है। और वहीं से छोटा मोटा कारोबार कर लेता है गाड़ी चलाने का।
खैर, सिक्किम से मैं वापस आ गया चंडीगढ़। आने के बाद कई बार अमृत से बातचीत होती रही। इसी बीच मैंने नौकरी बदली और लखनऊ आ गया। लखनऊ आने के बाद मेरे बहुत से नंबर गुम हो गए और उसी में गुम हो गया अमृत का नंबर। कुछ दिनों तक उसका इधर उधर से नंबर तलाशा। लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।
आज शाम को अचानक आए उसके फोन से ऐसा लगा कि शायद कोई अपना बरसों से बिछड़ा हुआ मिल गया हो। फोन पर उसकी आवाज से लग रहा था कि वो रो रहा है लेकिन आंसू बाहर नहीं गिर रहे होंगे। मेरी भी पलके गीली हो रही थी। कहने लगा कि शाब...आपका नंबर मैंने चंडीगढ़ वाले डॉक्टर शाब से लिया है। आप लखनऊ चले गए। बताया भी नहीं। नंबर भी नहीं दिया। शाब...हम ड्राइवर लोग...क्यों आप मेरा नंबर रखेगा...क्यों बताएगा शाब, हम लोगों को। हम लोग दस बारह दिन ही तो साथ रहा था। आप लोगों को ऐसा बहुत सा ड्राइवर मिलता होगा। लेकिन शाब...लेकिन शाब...इतना कहते हुए वो फफक पड़ा। कुछ सेंकेंड की चुप्पी के बाद बोला...शाब, आज मेरी गुड़िया की शादी है। आप आएगा नहीं। आपने ही तो कहा था कि...अमृत तुम जल्दी ठीक हो जाओ...और अपनी बेटी की शादी करो।  अब मैं ठीक हो गया हूं। आज हम लोग अपनी गुड़िया का शादी मना रहा है...पता है शाब...गुड़िया की शादी सेना में काम करने वाले से हो रहा है...इससे भी ज्यादा उसको यह बात बताने में गर्व महसूस हुआ कि...
शाब...हम लोग तो पहाड़ से नीचे कभी नहीं उतर पाया। लेकिन आपको मालूम हैं मेरी गुड़िया गोरखा रेजीमेंट में जलंधर जा रहा है। उसका पति वहींं पोस्वोट है। हंसते हुए उसने पूछा...शाब जी, वो पहाड़ तो नहीं है...इतना कहते हुए मैं भी हंस पड़ा...हां...हां...अमृत...वो मैदान ही है...

Saturday, July 5, 2014

फिर मिलेंगे....:)




 
चंडीगढ़ से निकलते हुए काफी लेट हो गया था। शिमला तक पहुंचते पहुंचते तो शाम होने को आ गई थी। बहुत दूर जाना था। शिमले से भी ऊपर। ठियोग से भी आगे। मशोबरा तक पहुंचते पहुंचते पहाड़ घुप्प अंधेरे में डूब गए थे। दूर पहाड़ों पर लाइटें टिमटिमाने लगी थीं। मैने अपनी कार की लाइटें भी जला दी थी। धुंध इतनी तेज थी कि पूछो मत। गाड़ी की स्पीड बहुत कम थी। सुनसान रास्ते में कोई आने जाने वाला भी नहीं दिख रहा था। अगर कोई दिख रहा था तो वह थे घोड़े और उनको ले जाने वाले कुछ लोग। जो कुफरी में रोज सुबह अपने धंधे पानी की तलाश में निकलने के बाद रात को वापस घर लौट रहे थे। अंजान रास्ता। मेरी कार की स्पीड चाहते हुए भी तेज नहीं हो पा रही थी। ठियोग पहुंचते ही फोन आयाहेलोसर...कहां तक पहुंचे। मैंने लोकेशन बताई। तो उधर से अवाज आईअच्छा ठीक है। तो आपको पहुंचते हुए नौ बज जाएंगे। मैंने भी कहां हां लग तो रहा है। शायद और ज्यादा ही वक्त लग जाए। क्योंकि धुंध बहुत है। वैसे यू डोंट वरी। मुझे आपके गांव का नाम पता है। सड़क पर ही है। मैं पहुंच जाऊंगा।
ये निशा के पति देवेश का फोन था। वहीं निशा जिसने कभी हमारे साथ काम किया था। मैं ट्रेनी जर्नलिस्ट था अमर उजाला चंडीगढ़ में। और निशा हिमाचल से मॉस कॉम की पढ़ाई पूरी करके इंटर्नशिप करने चंडीगढ़ आई थी। सीनियर था उसका सो रिस्पेक्ट बहुत करती थी। निशा की शादी कब हुई इसका पता नहीं लेकिन उससे सात साल बाद मुलाकात 2012 चंडीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में हुई थी। मुझे याद है एक शाम मैं खबरों को लिखने में लगा था। तभी फोन बजा। उधर से आवाज आई। हेलो सरसर मैं निशानिशा जिंटा। आपने मुझे पहचाना। मैं कुछ जवाब देता इतने में उधर से फिर आवाज आई। अरे सर मैं वहीं हूं जो आपके यहां इंटर्नशिप करने आई थी। शिमला से। कुछ याद आया। हांहां...याद आया। अरे निशा…इतने सालों बाद। क्या हाल है तुम्हारा। फिर उधर से जो आवाज आई वो रुंधे गले से थी। उसने बताया कि मेरे पति का शिमला से पहले बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। वो रोहड़ू से बस से शिमला आ रहे थे। बस खड्ड में गिर गई। उनको बहुत चोट आई है। डॉक्टरों ने कहा है कि स्पाइन की सर्जरी होगी। रिस्क बहुत बताया है। कहां है कि जान भी जा सकती है। इतना कहते हुए वह फोन पर ही रोने लगी। प्लीज कुछ करके उनको बचा लो। मैंने अपने जानने वाले एक डॉक्टर से सारा मामला बताया। तो उन्होंने अगली सुबह उसको चंडीगढ़ बुलाया। पूरा एक्जॉमिन करने के बाद उसका इलाज शुरू हुआ। एक महीने से ज्यादा इलाज चला अस्पताल में। मैं उसके पति से भी मिला। डॉक्टर ने नई जिंदगी दी थी इसलिए पति पत्नी बहुत खुश थे। इलाज के बाद दोनों हिमाचल वापस अपने गांव चले गए।
उसके बाद दोनों लोगों ने मुझे अपने गांव बहुत बुलाया। देवेश वहां के सरकारी इंटर कालेज में कहीं लेक्चरर है। निशा पता नहीं क्या कर रही है। लेकिन उसके एप्पल के आर्चर्ड हैं। खैर  लगातार फोन आते गए देवेश और निशा के। बहुत बार अपने गांव बुलायर लेकिन मैं पहुंच नहीं पाया। इसी दौरान मेरे चंडीगढ़ से बोरिया बिस्तरा पैक करने का वक्त भी आ गया। अमर उजाला में नोटिस पर चल रहा था। बारी थी घूमने की। सो देवेश और निशा के गांव चल पड़े।
तभी देवेश का गांव आ गया। एक दम सुनसान इलाके में। मई के महीने में भी ऐसा लग रहा था कि यहां पारा जम चुका हो। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। दूर…बहुत दूर…कहीं चांद निकलने की कोशिश कर रहा था। आधी रात हो चुकी थी। मैं अपनी वाइफ और बेटे के साथ गाडी से उतरा। देवेश और निशा समेत पूरा घर इंतजार कर रहा था। रात को खूब देर तक गप्पे मारी। फिर हम लोग सोने चले गए।
सुबह आंख खुली तो हमेशा की तरह सात आठ अखबार मेरे बेड पर पड़े थे। लखनऊ में कहने भर को मानसून पहुंच चुका था। सड़ी हुई गर्मी अभी भी मुंह चिढ़ा रही थी। एक खूबसूरत हसीन सपना जो पिछले साल हकीकत में था वो फिलहाल टूट चुका था…J

Saturday, November 30, 2013

चांद, रात और मनाली गांव


 

रात का शायद कोई तीसरा पहर रहा होगा। कमरे की खिड़की खुली हुई थी। दूर आसमान में चमकता हुआ चांद सामने की पहाड़ी पर बिछी बर्फ को और भी खूबसूरत कर रहा था। दिन में रोमांस की लहर पैदा करने वाली ब्यास नदी की कल कल रात के सन्नाटे में बहुत डरावनी लग रही थी। अचानक खुली नींद में मैंने देखा कि सौरभ सो रहा है। मैं फिर रजाई में घुस गया। चारो ओर से रजाई को दबाया लेकिन नींद नहीं आई। फिर थोड़ी देर बाद मै चुपचाप उठा। कमरे का दरवाजा खोला। तीसरी मंजिल पर बने होटल के कमरे से नीचे आया। देखा, मनाली गांव की पतली सड़के सुनसान थी। हालांकि पास वाले रेस्त्रां में जरूर कुछ इजारायली लंबी कश के छल्ले उड़ाकर गिटार पर कुछ गुनगुना रहे थे। उसको अनसुना कर मैं गांव की ऊंपरी चोटी पर चल दिया।

यह बात शायद दो साल पुरानी होगी। हम लोग चंडीगढ़ से मनाली में ‘ समर सनडाउनर्स ‘कार्यक्रम को कवर कनने गए थे। जिसमें अमर उजाला से मैं, दैनिक भास्कर से सौरभ द्विवेदी, पंजाब केसरी से राकेश, एचटी से फोटो जर्नलिस्ट कात्याल जी  एक महिला रिपोर्टर (जिनका मुझे नाम नहीं याद आ रहा)। हां, विश्व भारती भी था एचटी से। चूंकि उसकी ससुराल कुल्लू में हैं इालिए वह ऐसे ही मनाली आया था। खैर, एक बिजी शाम को बेहतरीन गांनों का आनंद लेने के बाद सभी लोग होटल पहुंचे। गपशप मारी और सोने चले गए। मैं और सौरभ एक रूम में थे। हम लोग बाते वाते करते करते सो गए लेकिन मेरी नींद आधी रात के बाद टूट गई। मैं कमरे से उतर कर मनाली गांव की ओर चल दिया। दरअसल हम लोग जिस होटल में रुके थे। उसके मालिक नरेन्द्र शर्मा जी मनाली गांच के ही रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनका घर गांव की सबसे ऊपरी चोटी पर मनु मंदिर के एक दम पास में है। बातचीत में उन्होंने बताया था कि सुबह सुबह मंदिर के कपाट खोलने की प्रक्रिया और फिर सन राइज के वक्त स्नो पीक्स की खूबसूरती अपने में अलग ही होती है। मैं इसी धुन में गांव की ओर चला जा रहा था। मोबाइल में घ़डी तकरीबन पौने तीन बजा रही थी। हजारों साल पुराने मनाली गांव के घर दूधिया रोशनी में अलग ही दिख रहे थे। मैं बढ़ा चला जा रहा था। तकरीबन आधे घंटे की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई के बाद मैं मनु मंदिर की चौखट पर था। ठंडी हवा तन और मन दोनों को को चुभो रही थी। लेकिन इस अहसास में कि कुछ तो नया देखने को मिलेगा। मैने नरेन्द्र का फोन मिलाया। मंदिर के बगल वाले घर से ही फोन की घंटी सुनाई दी। बेहद पुराना घर। लकड़ी का बना दो मंजिला। ग्राउंड फ्लोर पर गायों के खाने के लिए चारे का इंतजाम और उनके रहने का बंदोबस्त। बाहर से ही बनी सीढ़ियों से ऊपर जाकर घर वालों के रहने का इंतजाम। मनाली गांव के सभी घर ऐसे ही बने हैं। खैर, फोन उठाते ही नरेन्द्र को अपना परिचय दिया। वह नीचे आए। अब तकरीबन पौने चार होने को था। मंदिर के कपाट खुलने थे। पुरोहित ने पूजा अर्चना कर मंदिर के कपाट खोले। तकरीबन आधे गांव के लोग आ गए। पूजा अर्चना की। इसी के साथ सामने ग्लेशियर पर पड़ी बर्फ ने भी अपना रंग सफेद से बदल कर सुनहरा करना शुरू कर दिया था। नीचे घाटी में घनघोर अंधेरा और ऊपर की पहाड़ी पर पड़ी बर्फ का सुनहरा पन। नरेन्द्र से होटल में मिलने की बात कह कर मैं वापस अपने होटल आ गया। देखा सौरभ भाई अभी भी सो रहे हैं। मैंने भी रजाई उठाई और लंबी तान के सो गया।

 

Wednesday, May 1, 2013

लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...

सुबह पांच बजे उठा था। नहा धोकर तैयार हुआ। पौने छह बजे एयरफोर्स स्टेशन पर एक कार्यक्रम कवर करने पहुंचना था। सवा नौ बजे कार्यक्रम खत्म हुआ तो एक इंटरव्यू किया। वहां से सीधे मीटिंग के लिए दफ्तर भागा। सवा दस बजे के करीब ऑफिस पहुंचा। साढ़े ग्यारह बजे मीटिंग खत्म हुई। लिस्टिंग की। दफ्तर से नीचे उतरा। पौने बारह बजे पीजीआई पहुंचा। सवा बारह बजे वहां से निकला। अब तक चाय नहीं नसीब हुई थी। कुछ दोस्तों के साथ कैफे कॉफी डे पहुंचा। कॉफी का हलक गले से नीचे उतरा भी नहीं था कि भूकंप आ गया। कॉफी छोड़कर बाहर भागा। भूकंप की स्टोरी करने में जुट गया। मौसम विभाग के दफ्तर पहुंचा। भूकंप के आंकड़े जुटाए। तीन बज गए। वापस दफ्तर पहुंचा। कम्प्यूटर खोला। खबरे लिखनी शुरू की। डिफेंंस आफीसर का इंटरव्यू। इंडो-चाइना बार्डर के तनाव की स्टोरी। डिफेंस की रूटीन खबर। भूकंप की लाइव स्टोरी। भूंकप की आंकड़ेबाजी। रेलवे की अपनी खबर का असर। एलपीजी ऑटो वालों की हड़ताल। पीजीआई के डॉक्टरों के अवार्ड की खबर। कुछ विशेष ट्रेनों के चलाए जाने की खबर। नौ बजे गए खबरें लिखते लिखते। इसी बीच राजमा चावल जरूर खाए। साढ़े नौ बजे चेक चुक मार कर नीचे आया। गाड़ी उठाई। घर निकला। सवा दस बजे पंचकूला ऑफिस पहुंचा। वहां कैंटीन वाले ने बताया आज आपको खाना नसीब नहीं होगा। क्योंकि नॉनवेज बना है। पौने ग्यारह बजे घर पहुंचा। प्रिज खोला। दही निकाला। काले नमक के साथ मिक्स किया। खा लिया यह सोचकर कि चलो कुछ पेट ही कम हो जाएगा अगर एक रात खाना नहीं खाऊंगा।
पूरा दिन गुजर गया। पता ही नहीं चला कि आज वल्र्ड लेवर डे था। अभी फेसबुक पर अपडेट पढ़ा। लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...चेहरे पर मुस्कान खुद ब खुद यूं ही आ गई...

Sunday, November 4, 2012

काश, ये वोट बैंक होते

अगर भीड़ जीत का पैमाना होती तो शायद इंदिरा गांधी कभी न हारती। बाल ठाकरे जब जब हुंकार भरते पूरा मुंबई समुंदर की लहरों की तरह उनके पास सिमट आता। लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल हो गए। मायावती की एक आवाज पर हजारों हजार लोग दौड़े चले आते हैं लेकिन इस वक्त सत्ता को तरस रहीं हैं बहन जी। कभी आंध्र प्रदेश के हैदराबाद को सिलिकॉन वैली बनाने वाले तेलगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू का आज  लोग नाम भूलने लगे। आज की कांग्रेस की रैली में उमड़ी भीड़ को जीत का पैमाना मान लेना जरा जल्दी होगी। मैंने गांवों से बड़े शहरों में होने वाली रैलियां और उसमें जाने वालों की भीड़ देखी है। यकीन मानिए आधे से ज्यादा लोग बड़े शहरों के  रकाब तकाब देखने के जाते हैं। बहुत बड़ी तो नहीं लेकिन छोटी सी राजनैतिक पृष्ठभूमि होने के नाते मैंने देखा हैं अपने गांव से लखनऊ में होने वाली तमाम रैलियों में जाने वालों को। हर बार लोग वहीं होते हैं। बस अंतर सिर्फ हाथो में पकड़े गए झंडे और बैनर का होता है।
आमीन...

Saturday, October 20, 2012

...जो लौट के घर न आए

घर से तार पहुंचा था। पता चला कि सूबेदार सुरिन्दर विर्क के  बेटा हुआ है। विर्क तो मारे खुशी के बल्लियों उछल रहा था। खाना भी शायद ढंग से नहीं खाया था। अपनी बीबी हरप्रीत की फोटो को चांदी सी बिछी बर्फ पर लेटकर खूब चूमा था उसनें। मैं भी वहीं था। विर्क ने कहा...ओए...ढिल्लो..तू ताया बन गया है...ताया...। मुझे गले से लगाया और बर्फ पर गिरा दिया। फिर मेरा हाथ पकड़ कर बैठ गया। चंद सेकेंड की खामोशी के बाद ही एक सिसकती हुई आवाज के साथ विर्क के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मैंने पूछा ओए...विर्क...ये क्या...तू रो रहा है...अरे आज तो जश्न की रात है। विर्क कुछ नहीं बोला। फिर मेरे कंधे को बहुत ही तेजी से पकड़ कर बोला...ढिल्लो...पता नहीं मैं अपने बेटे को देख पाऊंगा भी या नहीं...मैंने तुरंत ही उसका मुंह दबाते हुए कहा...ऐसा न बोल। चंद रोज में जंग खत्म हो जाएगा। हम सब वापस अपने घर चलेंगे। फिर तूं अपने गांव में एक अच्छी सी पार्टी देना। मेरी बातों को सुनकर विर्क हंसा और बोला...ढिल्लो तुझे तो पता ही है क्या हालात हैं। हमारी ब्रिगेड के कई जवान चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो चुके हैं। उसने नाम बताया...वो...वो...सुखबीर...याद है...चार महीने पहले ही तो शादी हुई थी उसकी...चीनियों ने मार दिया। उसकी बीबी को तो पता भी नहीं होगा शायद। बस इसी का डर है...क्या होगा मेरी बीबी और बच्चे का...मैने कहा तू फिक्र न कर...भारत सरकार ने पंजाब और राजस्थान से कुछ और सेना की टुकडिय़ों को इस इलाके में भेज दिया है। हम लोग ज्यादा हो जाएंगे और चीनियों को मार भगाएंगे। लेकिन उसके दिल में न जाने कैसी उलझन हो रही थी...बोला...पता नहीं मेरा बेटा कैसा होगा...मुझ पर गया होगा या प्रीत पर...। बस जल्दी से युद्ध खत्म हो और मैं अपने घर जाऊं...अपने काके को देखने का बहुत जी कर रहा है।  मंैने उसे बहुत समझाया।
आधी रात बीत चुकी थी। संदेश मिला कि सेलापास के आगे डोएनारा इलाके में चीनी सैनिकों ने फिर से हमला कर दिया। आप लोग फौरन मोर्चा संभालो। मैं तो वायरलेस पर था ही। विर्क  अवनी ब्रिगेड के साथ मोर्चे पर पहुंच गया। युद्ध हुआ। ब्रिगेड के ज्यादातर लोग मारे गए। विर्क भी उनमें से एक था।
आज पचास साल हो गए हैं इस बात को। विर्क का बेटा भी पचास साल का हो गया है। अब कनाडा में सेटल है।  कभी कभार ही आता है इंडिया। सुना है कोई बड़ा बिजनेस करता है। मेरी उम्र भी ८३ साल के करीब है। सुना है कि विर्क की शहादत की खबर उसकी पत्नी नहीं बर्दाश्त कर पाई थी। कुछ दिन बाद ही चल बसी थी। उसके बेटे को उसकी मासी ने पाला था। जो बाद में उसको लेकर कनाडा चली गई थी। १९६२ में हुए भारत-चीन के युद्ध की बातें आज भी जख्मों को हरा कर देती हैं। अगर हमारी सरकार पहले से मुस्तैद होती तो शायद विर्क और उसके जैसे अनगिनत शहीद हुए जवान अपने परिवार को खुशियां दे रहे होते।
(१९६२ में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर ढिल्लो तवांग इलाके में तैनात थे। उनसे बातचीत पर आधारित )

Tuesday, October 16, 2012

...स्वातघाटी के हर घर में है मलाला

उसको देखने के बाद लगा कि शायद असली गुलाबी रंग ऐसा ही होता है। कभी घर से बाहर कदम न रखने वाली नाजनीन जब पहली बार चंडीगढ़ आई तो उसकी बड़ी बड़ी आंखों में मैंने समंदर से सपने पलते लेते देखे थे। पता नहीं उनके सपनों को पंख लगे भी होंगे या यूं ही कहीं फडफ़ड़ा कर दफन हो गए होंगे उस स्वात घाटी में जहां से वह आई थी।
नाजनीन स्वात घाटी से अपने दो भाईयों खुदाबक्श और शाहिद के साथ २००९ में चंंडीगढ़ में लगे एक ट्रेड फेयर में आई थी। बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़ी बहुत यादे अभी भी जेहन में हैं नाजनीन, खुदाबक्श और शाहिद से हुई मुलाकात की। नाजनीन की तमन्ना थी कि वह अपने अब्बू और भाईयों के हाथों से बनाई जाने वाली शालों के बिजनेस को नया मुकाम दे। लेकिन उसको एक डर हमेशा बना रहता था कि ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि स्वातघाटी में लड़कियों की पढ़ाई सबसे बड़ा जुर्म है, और बगैर पढ़े बिजनेस को बढ़ाया नहीं जा सकता। जो भाईयों ने पढ़ा था बस उससे ही सीखती थी नाजनीन। नाजनीन ने बताया था कि स्वातघाटी में तालिबानियों के गढ़ पियूचार कस्बे से ही तमाम बंदिशो के संदेश रेडियो पर आते रहते हैं। मुझे याद है उसने यही शब्द कहे थे...मैं अपने अब्बू और भाईयों का हाथ बंटाने के लिए पढूंगी चाहे जो हो जाए...अगर मैं घाटी से निकल कर चंडीगढ़ आ सकती हूं तो मैं वहां पढ़ भी सकती हूं...गजब का कांफीडेंस था उसमें।
अभी कुछ दिन पहले पता चला कि वहां की ऐसी ही एक चौदह साल की लड़की मलाला को तालिबानियों ने गोली मार दी। क्योंकि वह वहां की लड़कियों को पढ़ाने के लिए आगे आ रही थी। मलाला की घटना से मुझे नाजनीन की याद आ गई...पता नहीं उसके सपने सच हुए होंगे या वह भी अभागी मलाला बन चुकी होगी।



Monday, July 23, 2012

भेड़ बकरियों की तरह नहीं, यहां तसल्ली से देखेंगे डॉक्टर साहेब...


अवस्थी...शायद यही सर नेम था उस सिक्योरिटी गार्ड का। जब मैंने अपनी दादी मां को डॉक्टर से दिखलाने के लिए उसको पचास रुपये की घूस दी थी। वह फौरन अंदर गया और चंद मिनट बाद डॉक्टर को कार तक ले आया। जहां मेरी दादी मां बेसुध पड़ी थी। डॉक्टर ने देखा और कहा कि क्लॉटिंग ज्यादा हो गई है। उम्र बहुत ज्यादा है सर्जरी नहीं हो सकती। ऐसा करो...आप, बाहर नीलकंठ मेडिकल स्टोर है, वहा से एक महीने की दवाएं ले जाओ और फिर दिखा लेना।
मैं अपने पिता जी और एक दो अन्य रिश्तेदारों के साथ दवा लेकर वापस अपने कस्बे की ओर दादी को लेकर चल पड़ा। आज से तकरीबन बारह साल पहले मेरी दादी को ब्रेनस्ट्रोक हुआ था। मेरे कस्बे में तो कोई डॉक्टर था नहीं सो पास के सबसे बड़े शहर लखनऊ ही लेकर आना एक रास्ता बचता था। लखनऊ तो दादी मां को लेकर चल दिए लेकिन यह नहीं पता था कि दिखाना किसे है। किसी ने बातचीत में किंगजाार्ज मेडिकल कॉलेज के एक बड़े नामी गिरामी न्यूरो फिजीशियन का नाम बताया था। पहु़च गए उनके दरवाजे पर। लंबी लाइन। सैकडा़ें मरीज। दरवाजे पर एक बंदूकधारी सुरक्षा गार्ड...वही अवस्थी जी...। भीड़ देखकर लगा कि इलाज यहां भी करा पाना बहुत मुश्किल है। एक घंटा...दो घंटा...तीन...चार...जब शाम होने लगी तो मैने वहां खड़े सिक्योरिटी गार्ड से धीरे से पूछा...क्या कोई गुंजाईश है कि डॉक्टर साहब बाहर आकर मेरी दादी मां को देख सकें...वह पिछले चार घंटे से कार में लाचार पड़ी हैं। उसने पहले मेरी ओर देखा...फिर उस कार की ओर जिसमें दादी अचेतावस्था में पड़ी थी...थोड़ा सोच विचार कर मुझे किनारे ले गया और धीरे से कहा कि कुछ चाय पानी कराओंगे...मुझे लगा कि अब रास्ता मिल गया है। शायद मेरी दादी को डॉक्टर साहब देख लें..अवस्थी जी को पचास का नोट थमाया और अवस्थी जी डॉक्टर साहब के कमरे में....। थोड़ी देर में देखा कि छोटे कद के एक मोटे से डॉक्टर साहब आला लेकर कार के पास आ गए। खैर...मेरी दादी का इलाज उन डॉक्टर साहब के पास बहुत दिनों तक चला लेकिन वह मेरी दादी को नहीं बचा सके। इतने दिनों में अवस्थी जी ने दुनिया में काम कराने का एक तरीका जरूर सिखा दिया था।
समय करवट बदलने लगा। मैं पढ़ाई करने के लिए लखनऊ पहुंच गया। हिन्दुस्तान अखबार में बगैर पैसे के काम करने वाला स्ट्रिंगर बन गया। मेरे एक बड़े भाई समान सहयोगी मिले तो उनके साथ हेल्थ बीट में काम करने के लिए मेडिकल कॉलेज जाने लगा। वहां पर उन डॉक्टर साहब से भी मुलाकात होने लगी जिनके सिक्योरिटी गार्ड को पचास रुपये देकर में अपनी दादी को दिखाने जाता था।
समय थोड़ा और तेज चला। मैं लखनऊ के रास्ते चंडीगढ़ अमर उजाला आ गया। हेल्थ बीट में काम करने का मौका मिला। पीजीआई जैसे देश क्या पूरी दुनिया के सबसे बेहतरीन अस्पताल में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। उसी दैरान मेरे पीजीआई के एक बहुत करीबी हो चुके डॉक्टर दोस्त कम अंकल को इंडियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजी का प्रेसीडेंट बनाया गया। मैं उनके दफ्तर में बैठा था। तभी देखा कि कमरे के दरवाजे से एक मोटे से छोटे कद के एक डॉक्टर साहब अंदर घुसे। एक बारगी तो मैं उनको पहचान ही नहीं पाया...लेकिन दिमाग पर जोर डाला तो पाया कि यह तो लखनऊ वाले डॉक्टर साहब हैं। जिनके पास मैं अपनी दादी मां को लेकर जाया करता था। एैनीवे...बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ...पीजीआई वाले डॉक्टर साहब ने मेरा परिचय कराया और उनसे बातचीत शुरू हुई। तब पता चला कि कल से पीजीआई में शुरू होने वाले एथिक्स इन मेडिकल प्रैक्टिस के नेशनल सेमिनार में उक्त डॉक्टर साहब मुख्य वक्ता के तौर पर बोलने आए हैं। ...लखनऊ वाले डॉक्टर साहब पीजीआई के डॉक्टर साहब से अपने कल के होने वाले डिस्कशन के मुख्य बिंदुओं पर चरचा कर रहे थे...वह बार बार इस बात पर जोर दे रहे थे कि सरकार द्वारा मिलने वाला नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस (प्राइवेट इलाज न करने पर सरकार द्वारा दिए जाने वाले वाला भत्ता ) अब और बढऩा चाहिए। मुझे उनकी इन बातों को सुनकर अपनी दादी मां की झुर्रियों वाला वह चेहरा याद आ रहा था कि मेडिकल कॉलेज के सरकारी डॉक्टर के घर में कैसे घंटों पड़े रहने के बाद इलाज होता था। आज भी याद है वह शब्द...जब सिक्योरिटी गार्ड कहता था...डॉक्टर साहब अभी तो मेडिकल कॉलेज से आए हैं...थोड़ा इंतजार करो...बहुत सही जगह आए हो...अस्पताज में तो भेड़ बकरियों की तरह भीड़ हाती है...घर पर तो बहुत तसल्ली से देखेंगे...
:(    

:)   
:)
:)
:)

Thursday, January 26, 2012

...क्या बीती होगी उस लाचार पिता पर

उमर यही कोई साठ आठ साल रही होगी उसकी। मटमैली सी नीली कमीज। काला रंग। बाल देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल न था कि उसकी हफ्तों से कंघी तक नहीं हुई थी। रात को रह रह कर यह मटमैली नीली कमीज वाला बच्चा कराह उठता। पास में लेटी उसकी दादी उठकर अपने पोते के पेट को सहलाती लेकिन जब राहत नहीं मिली तो बूढ़ी दादी बेचैन हो उठी। तभी इमरजेंसी के डॉक्टर पहुंचे कुछ दवाएं दी और वह बच्चा चुप होकर सो गया।
२० जनवरी को मेरा बेटा भी मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में दाखिल था। मैं अपी पत्नी के साथ सुबह उठकर बैठा ही था कि देखा वही मटमैली कमीज वाला बच्चा एक बार फिर से दर्द के मारे कराह रहा था। मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने डॉक्टर से कहा कि इसको आकर देखे। चूंकि उस वक्त सुबह के आठ बज रहे थे सो शिफ्ट बदल रही थी इसलिए थोड़ा वक्त लग रहा था। लेकिन थोड़ी देर बाद डॉक्टर ने बच्चे को देखकर कुछ दवाओं को लाने को कहा। एक कागज की पर्ची लेकर नर्स ने पास में खड़े उस बच्चे के पिता को दी। दवा की पर्ची देखकर उस बच्चे के परिजनों में बहुत देर बगैर कुछ बोले ही आंखों ही आंखों में बात होती रही। पता नहीं क्या बात हुई लेकिन जो दूर से लगा कि वह शायद यही था कि मामला कुछ पैसों का है। खैर, बेड पर बैठी बूढ़ी दादी ने अपने बेटे की ओर उन नजरों से देखा कि मानों पूछ रही हो कि बेटा...अब मेरे पोते का इलाज कैसे होगा। चंडीगढ़ में रिक्शा चलाता था उस बच्चे की पिता। उसने कुछ देर तक पर्ची को हाथ में रखा और फिर इधर उधर घूमने लगा। चूंकि मैं यह सब देख रहा था। मन में आया कि एक बार पूंछू। अगर हजार-पांच सौ रुपये देने की जरूरत होगी तो मैं दे दूंगा। ज्यादा रुपयों की जरूरत होगी तो किसी एनजीओ से कहकर या अस्पताल प्रशासन से गुजारिश करके मरीज को पुअर फ्री करवाने की कोशिश करूंगा। लेकिन मेरा बेटा खुद बीमार था। वह डायरिया की वजह बहुत सुस्त था। सो मैंने सोचा कि एक बार मैं अपने बेटे के इलाज के लिए डॉक्टर से बात कर लूं फिर मैं उस बच्चे के घर वालों से बात करूंगा। दोपहर हो गई। तभी मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा कि वो जो बच्चा रो रहा था वह बड़ी देर से बेड पर नहीं दिखा। मैंने कहा...गए होंगे कोई टेस्ट करवाने के लिए नीचे। यहां टेस्ट में टाइम ज्यादा लगता है, इसलिए आते ही होंगे। शाम के छह बज गए। मेरे बेटे के डॉक्टर ने यह कहते हुए घर जाने को कह दिया कि अब आपके बेटे की तबियत ठीक है। हम लोगों ने अपना सामान उठाया और बाहर निकलने लगे। उस मटमैली नीली कमीज वाले बच्चे का बेड खाली था। मैंने नर्स से चलते चलते पूछा कि...सिस्टर...ये बच्चा कहां गया। तो उसने कहा...चले गए...शायद ये लोग चले गए। इनके पास पैसे नहीं थे। बगैर बताए ही निकल गए। ये देखिए...इलाज के कागज, दवाएं, रसीद, पर्चिंया...सब कुछ तो यहीं छोड़ गए...।  इतना सुनना था कि मै स्तब्ध रह गया। लेकिन नर्स फिर भी बताने में लगी थी...बड़े ही चालाक होते हैं ये लोग...किसी को पता न चले इसलिए कोई दवाएं भी नहं ले जाते और एक एक करके निकल जाते हैं...मैंने उस नर्स की इन बातों के अलावा कुछ भी नहीं सुना हालांकि वह बोल तो और भी न जाने क्या क्या रही थी। भारी मन से मैं बाहर निकला। बार बार रास्ते मे मैं अपनी पत्नी से यही कहता रहा...यार मैंने उसको उसी वक्त रुपये क्यों नहीं दे दिए। शायद एक दिन की दवा का तो इंतजाम हो जाता...

Tuesday, August 2, 2011

जिंदू...अरे ओ जिंदू...कहां हैं तू...

बात शायद सन निन्यानवे की है। रात का आधा पहर बीतने को था...पहाड़ पर सन्नाटा था...अगर कोई आवाज उस सन्नाटे को चीरती भी थी तो वह सिर्फ कुछ जानवरों की आवाजें ही थीं। मैं बढ़ा चला जा रहा था। उस ओर जहां पर उसने मुझसे मिलने को कहा था। तकरीबन शहर से तीन किलोमीटर दूर मैं उसकी बताई हुई जगह पर पहुंचा। देखा कि पहाड़ी के ऊपर एक छोटी सी झोपड़ीनुमा कोई जगह हैं जहां पर लाइट टिमटिमा रही है। मैं उस ओर बढ़ा। तभी किसी ने मेरा हाथ झट से पकड़ लिया...मैं पीछे मुड़ा तो देखा...कि तकरीबन नौ साल का एक छोटा सा लड़का खड़ा था। मैंने उसको देखा और पूछा...तुम...तुम यहां हो..तुमने तो कहा था कि घर पर आना। सो मैं उधर ही जा रहा था। जिंदगी नाम था उसका...पता नहीं कैसा नाम रखा था उसके घर वालों ने...जिंदगी...खैर मैने कहा...लेकिन जिंदू तुझे तो इस वक्त हर हाल में घर में होना चाहिए था...फिर कौन होगा घर में...उसने कहा कि कोई नहीं...दादी ही हैं...उसने मेरी उंगली पकड़ी ओर मुझे अपने घर की ओर लेकर चल पड़ा।
एक कमरा उसके पीछे एक छोटा सा कमरा। शायद वह कमरा खाना बनाने के आता था। लेकिन देखने पर ऐसा लगा कि यहां पर सालों से चूल्हा ही नहीं जला। एक लकड़ी का तखत था जो शायद आज कल...आज कल में टूट सकता था। उस पर करीब पैंसठ साल की एक बूढ़ी बुजुर्ग महिला लेटी थी। लाचारी और गरीबी ने शायद उम्र को और बढ़ा दिया था। खैर, मुझे देखकर उठने की कोशिश की लेकिन मैंने उनको लिटा दिया। खरखराहट भरी आवाज में कहा कि...जिंदू...तू अब आ पाया है। मैंने तो खाना भी अभी नहीं खाया है...उसने अपने झोले से एक कपड़ा निकाला उसमें कुछ रोटियां थी। एक कटोरे जैसा बर्तन था उसमें दाल और सब्जी मिक्स थी। जिंदू झट से गया और एक साफ कटोरी तथा थाली ले आया। जिसमें उसने दो रोटी और थोडी सी मिक्स वाली दाल सब्जी डाल कर मेरे सामने परोस दी। और खुद कपड़े से रोटियों को निकाल पर अपनी दादी के तखत पर बैठ कर उनको खिलाने लगा। महज नौ साल के मासूम जिंदू को देखकर उसकी मासूमियत का अंदाजा तो लग रहा था लेकिन शायद जिम्मेदारियों ने उसको कब का बड़ा और मेच्योर बना दिया था। मुझसे बोला...भैया...आप आराम से खाइये में दादी के साथ खाकर इनको दवा भी खिलाऊंगा। मैंने हां में सिर हिलाकर रोटी का एक टुकड़ा और मुंह में डाला।
जिंदू...यही वही लड़का है जब मैं पहली बार नैनीताल गया था तो बस से उतरने के बाद सबसे पहले मिला था। एक बैग था मेरे पास उसको उसने पकड़ कर कहा था..भैया...आइये मैं आपको होटल दिखलाता हूं...बहुत अच्छा होटल है...रेट भी वाजिब हैं...कंबल भी मिलेगा...और चाय बनाने वाली मशीन भी कमरे होगी...और न जाने कौन कौन सी बाते होटल के बारे में बता रहा था। वहां पर ऐसे बहुत से लोग थे अपने कमीशन के चक्कर में मुझको होटल में ले जाने के लिए आगे पीछे लगे थे लेकिन मैंने उससे पूछा...चलो कहां है आपका होटल। मॉल रोड से ऊपर बिड़ला विद्या मंदिर को जाने वाले रास्ते पर लेकर वह चला। रास्ते में बातचीत भी हुई। बोला...भैया इस वक्त तो ऑफ सीजन है न...इसलिए चार सौ रुपये में कमरा मिल जाएगा...वरना सीजन में तो इन्हीं कमरों के दो से तीन हजार रुपये तक वसूले जाते हैं। मैंने भी रास्ता काटने के लिए पूछ लिया कि तुम्हे कितने मिलते हैं...यह सुनकर वह तुरंत बोला...मुझे...मुझे कभी कभार ही मिलते हैं। लेकिन खाना दोनों समय का मिल जाता है। मेरी दादी के लिए भी ये लोग खाना दे देते हैं। इसलिए मैं बस स्टैंड पर हर आने वाले को यहां लाने की कोशिश करता हूं। इतनी बातों में होटल भी आ गया था। उसने हमें लेक की ओर का कमरा दिलवाया। मुझे उसकी बातें सुनकर बहुत अच्छा लगा सो मैंने उसको अपने कमरे में बुलवाया। पूछा तुम्हारा नाम क्या है...बोला घर में दादी जिंदू कहती है...वैसे स्कूल का नाम जिंदगी है। मैंने पूछा कहां पढ़ते हो...तो उसने कहा कि कहीं नहीं...पहले पढ़ता था...और इतना कहते हुए वह कमरे से भाग गया। शायद किसी और कस्टमर को लाने के लिए बस स्टैंड पर। मैं भी नहा धोकर अपने काम के लिए चला गया। लौटकर शाम को आया तो देखा कि जिंदू...होटल के रिसेप्शन पर खड़ा था। मैंने उससे हेलो की और वहीं पड़े दो सोफों में से एक पर खुद बैठ गया और एक पर उसे बिठाया। इस बार बड़ी तसल्लीबक्श उससे बात की। उसने बताया कि उसको पता नहीं कि मां बाप क्या होते हैं। जब से जानने वाला हुआ हूं तब से दादी को ही देखा है। पहले वह भी मॉल रोड की दुकानों में साफ सफाई का काम करती थी अब बीमारी से वह सब छूट गया है। सारा बोझ उस नन्हीं सी जान पर आ गया है। दवा से लेकर खाने तक का इंतजाम उसको ही करना पड़ता है। उससे बात करके और मिलकर बहुत अच्छा लगा मुझे। उसी दिन मुझे वापस भी आना था सो रात की बस पर वह मुझे चढ़ाने के लिए भी आया। मैंने उसको सौ रुपये निकाले और दिए। पहले तो उसने लेने से मना कर दिया लेकिन काफी जिद करने पर उसने रुपये रख लिए। बस चल पड़ी। लालकुंआ पहुंचा और अपनी ट्रेन में बैठ गया। पांच घंटे के सफर के बाद मैं अपने घर पहुंच गया। तकरीबन तीन बजे के करीब मैं घर पहुुंचा और सोने की तैयारी करने लगा। नींद ही नहीं आई। उस बच्चे के बारे में सोचता रहा। खैर सुबह हुई और मैं उठा। उन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था। कॉलेज पहुंचा और अपने दोस्तों में मगन हो गया। धीरे धीरे एक महीना, दो महीने, चार महीने और छह महीने बीतते बीतते दो साल हो गए। एक दिन मुझे जिंदगी की याद आई तो मैंने नैनीताल के उस होटल में फोन मिलाया। मैंने पूछा कि एक आपके यहां लड़का काम करता है जिंदगी...क्या बात हो जाएगी उससे। उधर से जवाब आया कि वह तो पिछले तीन महीने से नहीं आ रहा है। उसकी दादी की तबियत ज्यादा खराब थी तो उसने बस स्टैंड के पास एक चाय की दुकान पर नौकरी कर ली। मैंने पूछा कि क्या वहां का कोई नंबर होगा। उसने न में जवाब दिया तो मानों ऐसा लगा कि शायद सब कुछ शून्य सा हो गया हो। बड़ा अजीब लगा मुझे। मैं जैसे तैसे बहाना बनाकर नैनीताल पहुंच गया। बस स्टैंड पर बहुत से चाय वाले देखे लेकिन मुझे जिंदू कहीं नहीं दिखा। लोगों से पूछा, उस होटल में जाकर भी पूछा लेकिन कुछ पता नहीं चला। में मायूस होकर मॉल रोड से नैना देवी मंदिर की ओर जाने लगा। जैसे ही मंदिर के पास पहुंचा तो देखा कि कुछ चाय वाले उधर भी हैं। मैने सोचा उनसे ही पूछ लूं...तभी देखा कि जिंदगी चार चाय के खाली ग्लास लेकर आ रहा है। उसने मुझे देखा तो एक बारगी पहनान ही नहीं पाया। उसको मेरे आने का मकसद भी नहीं पता था। उसको देखकर ऐसा लगा कि मानों सालों से खोया कोई अपना मिल गया हो। उसने मुझे पुराना जान पहचान का युवक समझ कर चाय पिलाई। मैंने पूछा कि अब दादी कैंसी हैं। बोला कि ठीक नहीं है। तभी तो अब कुछ पैसों के लिए यहां काम करना पड़ा। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हारी दादी से मिलना चाहता हूं। उसने एक झटके में हां कर दी...और कहा कि भैया...फिर आपको रात को आना होगा...तकरीबन ग्यारह बजे के बाद...मैं तभी घर पहुंचता हूं। मैने हां कर दी और उसने अपना पता बता दिया।
खाना खतम हो चुका था। जिंदगी ने मेरे सामने रखी थाली हटाई। और कहा कि भैया मिलो दादी से...। मैंने उनसे बात की तो पता चला कि उनको स्पाइन की कोई समस्या है। डॉक्टरों ने कहा कि या तो इसका इलाज दिल्ली एम्स में है या फिर पीजीआई चंडीगढ़। मैं दोनों लोगों से ढेर देर तक बाते करता रहा। मैंने बूढ़ी दादी को बताया कि मैं अभी पढ़ाई कर रहा हूं...लेकिन जब कभी नौकरी लगेगी तो मैं आपके इलाज में जितनी मदद कर सकूंगा उतनी करूंगा। इतना सुनते ही जिंदू मेरे गले लिपट गया...और मैं उसकी तथा अपनी आंखों में आए आंसुओं को पोछता रहा...रात के करीबन डेढ़ बज रहे थे तो मैंने जिंदू को मेरी जेब में जितने रुपये थे उनमें से महज डेढ़ सौ रुपये छोड़कर सब दे दिए। मुझे जहां तक याद आ रहा है...शायद उसको तैतीस सौ रुपये दिए थे। मैं वहां से चल पड़ा...रात को बस पकड़ी...बरेली और बरेली सीधे गोला...।
समय बीतता गया और मैं दाने पानी के जुगाड़ में लखनऊ, बरेली, बदायूं और फिर वापस लखनऊ...उसके बाद चंडीगढ़ का रास्ता पकड़ लिया। नौकरी के लिए संघर्ष करना पड़ा सो एक लंबे अंतराल तक जिंदू से बात नहीं हुई। सन दो हजार छह में अचानक मेरे मोबाइल पर एक फोन आया...जिस नंबर से फोन आया दरअसल वह नंबर कभी मेरा होता था लेकिन चंडीगढ़ आने से पहले उसको बंद करा दिया था। इसलिए यह नंबर अब किसी बलिया के व्यक्ति ने ले लिया था। खैर, उस फोन करने वाले ने बताया कि आपका नया नंबर मुझे आपके पुराने संस्थान से मिला है। दरअसल एक जिंदू नाम का कोई लड़का आपको बहुत फोन करता था। मैं उससे बार बार कहता था कि यह नंबर अब मेरे पास है लेकिन वह यही जिद करता था कि भैया से पूछो वह मुझसे किस बात से नाराज हैं। क्यों नहीं बात करते हैंं मुझसे....फोन करने वाला शख्स यह बताता रहा और मेरी आंखो से झर झर आंसू बहते रहे। मैंने उससे पूछा कोई नंबर होगा जिससे वह फोन करता था। उसने जो नंबर दिया मैंने तत्काल उस पर फोन किया तो पता चला कि वह किसी पीसीओ का नंबर है लेकिन वह जिंदू को जानता था। पीसीओ वाले ने कहा कि...सर...जिंदू तो अब इस दुनिया में नहीं रहा...अपनी दादी का इलाज कराने जा रहा था...रास्ते में उनकी बस खड्ड में गिर गई। जहां दोनों लोगों की मौत हो गई...। इतना सुनते ही मैं चीख पड़ा....और मेरी चीख सुनकर मेरी बीबी ने मुझको हिलाते हुए जगाया और चिल्लाई...कौन सा सपना देख लिया जो इतनी तेज चीखे हो...देखो...आरव(मेरा एक साल का बेटा) भी जाग गया...मैं तुंरत उठा...घडी की ओर देखा तो सुबह के सवा सात बजे थे...बाहर मौसम सुहाना था...मैं सैर के लिए निकल पड़ा...उस सपने को याद करते हुए...जो कभी सालों पहले हकीकत हुआ करता था...उस जिंदू को जो मुझे पहली बार नंगे पांव बस स्टैंड पर मिला था...।