Saturday, July 5, 2014

फिर मिलेंगे....:)




 
चंडीगढ़ से निकलते हुए काफी लेट हो गया था। शिमला तक पहुंचते पहुंचते तो शाम होने को आ गई थी। बहुत दूर जाना था। शिमले से भी ऊपर। ठियोग से भी आगे। मशोबरा तक पहुंचते पहुंचते पहाड़ घुप्प अंधेरे में डूब गए थे। दूर पहाड़ों पर लाइटें टिमटिमाने लगी थीं। मैने अपनी कार की लाइटें भी जला दी थी। धुंध इतनी तेज थी कि पूछो मत। गाड़ी की स्पीड बहुत कम थी। सुनसान रास्ते में कोई आने जाने वाला भी नहीं दिख रहा था। अगर कोई दिख रहा था तो वह थे घोड़े और उनको ले जाने वाले कुछ लोग। जो कुफरी में रोज सुबह अपने धंधे पानी की तलाश में निकलने के बाद रात को वापस घर लौट रहे थे। अंजान रास्ता। मेरी कार की स्पीड चाहते हुए भी तेज नहीं हो पा रही थी। ठियोग पहुंचते ही फोन आयाहेलोसर...कहां तक पहुंचे। मैंने लोकेशन बताई। तो उधर से अवाज आईअच्छा ठीक है। तो आपको पहुंचते हुए नौ बज जाएंगे। मैंने भी कहां हां लग तो रहा है। शायद और ज्यादा ही वक्त लग जाए। क्योंकि धुंध बहुत है। वैसे यू डोंट वरी। मुझे आपके गांव का नाम पता है। सड़क पर ही है। मैं पहुंच जाऊंगा।
ये निशा के पति देवेश का फोन था। वहीं निशा जिसने कभी हमारे साथ काम किया था। मैं ट्रेनी जर्नलिस्ट था अमर उजाला चंडीगढ़ में। और निशा हिमाचल से मॉस कॉम की पढ़ाई पूरी करके इंटर्नशिप करने चंडीगढ़ आई थी। सीनियर था उसका सो रिस्पेक्ट बहुत करती थी। निशा की शादी कब हुई इसका पता नहीं लेकिन उससे सात साल बाद मुलाकात 2012 चंडीगढ़ के मेडिकल कॉलेज में हुई थी। मुझे याद है एक शाम मैं खबरों को लिखने में लगा था। तभी फोन बजा। उधर से आवाज आई। हेलो सरसर मैं निशानिशा जिंटा। आपने मुझे पहचाना। मैं कुछ जवाब देता इतने में उधर से फिर आवाज आई। अरे सर मैं वहीं हूं जो आपके यहां इंटर्नशिप करने आई थी। शिमला से। कुछ याद आया। हांहां...याद आया। अरे निशा…इतने सालों बाद। क्या हाल है तुम्हारा। फिर उधर से जो आवाज आई वो रुंधे गले से थी। उसने बताया कि मेरे पति का शिमला से पहले बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है। वो रोहड़ू से बस से शिमला आ रहे थे। बस खड्ड में गिर गई। उनको बहुत चोट आई है। डॉक्टरों ने कहा है कि स्पाइन की सर्जरी होगी। रिस्क बहुत बताया है। कहां है कि जान भी जा सकती है। इतना कहते हुए वह फोन पर ही रोने लगी। प्लीज कुछ करके उनको बचा लो। मैंने अपने जानने वाले एक डॉक्टर से सारा मामला बताया। तो उन्होंने अगली सुबह उसको चंडीगढ़ बुलाया। पूरा एक्जॉमिन करने के बाद उसका इलाज शुरू हुआ। एक महीने से ज्यादा इलाज चला अस्पताल में। मैं उसके पति से भी मिला। डॉक्टर ने नई जिंदगी दी थी इसलिए पति पत्नी बहुत खुश थे। इलाज के बाद दोनों हिमाचल वापस अपने गांव चले गए।
उसके बाद दोनों लोगों ने मुझे अपने गांव बहुत बुलाया। देवेश वहां के सरकारी इंटर कालेज में कहीं लेक्चरर है। निशा पता नहीं क्या कर रही है। लेकिन उसके एप्पल के आर्चर्ड हैं। खैर  लगातार फोन आते गए देवेश और निशा के। बहुत बार अपने गांव बुलायर लेकिन मैं पहुंच नहीं पाया। इसी दौरान मेरे चंडीगढ़ से बोरिया बिस्तरा पैक करने का वक्त भी आ गया। अमर उजाला में नोटिस पर चल रहा था। बारी थी घूमने की। सो देवेश और निशा के गांव चल पड़े।
तभी देवेश का गांव आ गया। एक दम सुनसान इलाके में। मई के महीने में भी ऐसा लग रहा था कि यहां पारा जम चुका हो। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। दूर…बहुत दूर…कहीं चांद निकलने की कोशिश कर रहा था। आधी रात हो चुकी थी। मैं अपनी वाइफ और बेटे के साथ गाडी से उतरा। देवेश और निशा समेत पूरा घर इंतजार कर रहा था। रात को खूब देर तक गप्पे मारी। फिर हम लोग सोने चले गए।
सुबह आंख खुली तो हमेशा की तरह सात आठ अखबार मेरे बेड पर पड़े थे। लखनऊ में कहने भर को मानसून पहुंच चुका था। सड़ी हुई गर्मी अभी भी मुंह चिढ़ा रही थी। एक खूबसूरत हसीन सपना जो पिछले साल हकीकत में था वो फिलहाल टूट चुका था…J

Saturday, November 30, 2013

चांद, रात और मनाली गांव


 

रात का शायद कोई तीसरा पहर रहा होगा। कमरे की खिड़की खुली हुई थी। दूर आसमान में चमकता हुआ चांद सामने की पहाड़ी पर बिछी बर्फ को और भी खूबसूरत कर रहा था। दिन में रोमांस की लहर पैदा करने वाली ब्यास नदी की कल कल रात के सन्नाटे में बहुत डरावनी लग रही थी। अचानक खुली नींद में मैंने देखा कि सौरभ सो रहा है। मैं फिर रजाई में घुस गया। चारो ओर से रजाई को दबाया लेकिन नींद नहीं आई। फिर थोड़ी देर बाद मै चुपचाप उठा। कमरे का दरवाजा खोला। तीसरी मंजिल पर बने होटल के कमरे से नीचे आया। देखा, मनाली गांव की पतली सड़के सुनसान थी। हालांकि पास वाले रेस्त्रां में जरूर कुछ इजारायली लंबी कश के छल्ले उड़ाकर गिटार पर कुछ गुनगुना रहे थे। उसको अनसुना कर मैं गांव की ऊंपरी चोटी पर चल दिया।

यह बात शायद दो साल पुरानी होगी। हम लोग चंडीगढ़ से मनाली में ‘ समर सनडाउनर्स ‘कार्यक्रम को कवर कनने गए थे। जिसमें अमर उजाला से मैं, दैनिक भास्कर से सौरभ द्विवेदी, पंजाब केसरी से राकेश, एचटी से फोटो जर्नलिस्ट कात्याल जी  एक महिला रिपोर्टर (जिनका मुझे नाम नहीं याद आ रहा)। हां, विश्व भारती भी था एचटी से। चूंकि उसकी ससुराल कुल्लू में हैं इालिए वह ऐसे ही मनाली आया था। खैर, एक बिजी शाम को बेहतरीन गांनों का आनंद लेने के बाद सभी लोग होटल पहुंचे। गपशप मारी और सोने चले गए। मैं और सौरभ एक रूम में थे। हम लोग बाते वाते करते करते सो गए लेकिन मेरी नींद आधी रात के बाद टूट गई। मैं कमरे से उतर कर मनाली गांव की ओर चल दिया। दरअसल हम लोग जिस होटल में रुके थे। उसके मालिक नरेन्द्र शर्मा जी मनाली गांच के ही रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनका घर गांव की सबसे ऊपरी चोटी पर मनु मंदिर के एक दम पास में है। बातचीत में उन्होंने बताया था कि सुबह सुबह मंदिर के कपाट खोलने की प्रक्रिया और फिर सन राइज के वक्त स्नो पीक्स की खूबसूरती अपने में अलग ही होती है। मैं इसी धुन में गांव की ओर चला जा रहा था। मोबाइल में घ़डी तकरीबन पौने तीन बजा रही थी। हजारों साल पुराने मनाली गांव के घर दूधिया रोशनी में अलग ही दिख रहे थे। मैं बढ़ा चला जा रहा था। तकरीबन आधे घंटे की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई के बाद मैं मनु मंदिर की चौखट पर था। ठंडी हवा तन और मन दोनों को को चुभो रही थी। लेकिन इस अहसास में कि कुछ तो नया देखने को मिलेगा। मैने नरेन्द्र का फोन मिलाया। मंदिर के बगल वाले घर से ही फोन की घंटी सुनाई दी। बेहद पुराना घर। लकड़ी का बना दो मंजिला। ग्राउंड फ्लोर पर गायों के खाने के लिए चारे का इंतजाम और उनके रहने का बंदोबस्त। बाहर से ही बनी सीढ़ियों से ऊपर जाकर घर वालों के रहने का इंतजाम। मनाली गांव के सभी घर ऐसे ही बने हैं। खैर, फोन उठाते ही नरेन्द्र को अपना परिचय दिया। वह नीचे आए। अब तकरीबन पौने चार होने को था। मंदिर के कपाट खुलने थे। पुरोहित ने पूजा अर्चना कर मंदिर के कपाट खोले। तकरीबन आधे गांव के लोग आ गए। पूजा अर्चना की। इसी के साथ सामने ग्लेशियर पर पड़ी बर्फ ने भी अपना रंग सफेद से बदल कर सुनहरा करना शुरू कर दिया था। नीचे घाटी में घनघोर अंधेरा और ऊपर की पहाड़ी पर पड़ी बर्फ का सुनहरा पन। नरेन्द्र से होटल में मिलने की बात कह कर मैं वापस अपने होटल आ गया। देखा सौरभ भाई अभी भी सो रहे हैं। मैंने भी रजाई उठाई और लंबी तान के सो गया।

 

Wednesday, May 1, 2013

लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...

सुबह पांच बजे उठा था। नहा धोकर तैयार हुआ। पौने छह बजे एयरफोर्स स्टेशन पर एक कार्यक्रम कवर करने पहुंचना था। सवा नौ बजे कार्यक्रम खत्म हुआ तो एक इंटरव्यू किया। वहां से सीधे मीटिंग के लिए दफ्तर भागा। सवा दस बजे के करीब ऑफिस पहुंचा। साढ़े ग्यारह बजे मीटिंग खत्म हुई। लिस्टिंग की। दफ्तर से नीचे उतरा। पौने बारह बजे पीजीआई पहुंचा। सवा बारह बजे वहां से निकला। अब तक चाय नहीं नसीब हुई थी। कुछ दोस्तों के साथ कैफे कॉफी डे पहुंचा। कॉफी का हलक गले से नीचे उतरा भी नहीं था कि भूकंप आ गया। कॉफी छोड़कर बाहर भागा। भूकंप की स्टोरी करने में जुट गया। मौसम विभाग के दफ्तर पहुंचा। भूकंप के आंकड़े जुटाए। तीन बज गए। वापस दफ्तर पहुंचा। कम्प्यूटर खोला। खबरे लिखनी शुरू की। डिफेंंस आफीसर का इंटरव्यू। इंडो-चाइना बार्डर के तनाव की स्टोरी। डिफेंस की रूटीन खबर। भूकंप की लाइव स्टोरी। भूंकप की आंकड़ेबाजी। रेलवे की अपनी खबर का असर। एलपीजी ऑटो वालों की हड़ताल। पीजीआई के डॉक्टरों के अवार्ड की खबर। कुछ विशेष ट्रेनों के चलाए जाने की खबर। नौ बजे गए खबरें लिखते लिखते। इसी बीच राजमा चावल जरूर खाए। साढ़े नौ बजे चेक चुक मार कर नीचे आया। गाड़ी उठाई। घर निकला। सवा दस बजे पंचकूला ऑफिस पहुंचा। वहां कैंटीन वाले ने बताया आज आपको खाना नसीब नहीं होगा। क्योंकि नॉनवेज बना है। पौने ग्यारह बजे घर पहुंचा। प्रिज खोला। दही निकाला। काले नमक के साथ मिक्स किया। खा लिया यह सोचकर कि चलो कुछ पेट ही कम हो जाएगा अगर एक रात खाना नहीं खाऊंगा।
पूरा दिन गुजर गया। पता ही नहीं चला कि आज वल्र्ड लेवर डे था। अभी फेसबुक पर अपडेट पढ़ा। लिखा था मजदूर दिवस मुबारक हो...चेहरे पर मुस्कान खुद ब खुद यूं ही आ गई...

Sunday, November 4, 2012

काश, ये वोट बैंक होते

अगर भीड़ जीत का पैमाना होती तो शायद इंदिरा गांधी कभी न हारती। बाल ठाकरे जब जब हुंकार भरते पूरा मुंबई समुंदर की लहरों की तरह उनके पास सिमट आता। लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता से बेदखल हो गए। मायावती की एक आवाज पर हजारों हजार लोग दौड़े चले आते हैं लेकिन इस वक्त सत्ता को तरस रहीं हैं बहन जी। कभी आंध्र प्रदेश के हैदराबाद को सिलिकॉन वैली बनाने वाले तेलगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू का आज  लोग नाम भूलने लगे। आज की कांग्रेस की रैली में उमड़ी भीड़ को जीत का पैमाना मान लेना जरा जल्दी होगी। मैंने गांवों से बड़े शहरों में होने वाली रैलियां और उसमें जाने वालों की भीड़ देखी है। यकीन मानिए आधे से ज्यादा लोग बड़े शहरों के  रकाब तकाब देखने के जाते हैं। बहुत बड़ी तो नहीं लेकिन छोटी सी राजनैतिक पृष्ठभूमि होने के नाते मैंने देखा हैं अपने गांव से लखनऊ में होने वाली तमाम रैलियों में जाने वालों को। हर बार लोग वहीं होते हैं। बस अंतर सिर्फ हाथो में पकड़े गए झंडे और बैनर का होता है।
आमीन...

Saturday, October 20, 2012

...जो लौट के घर न आए

घर से तार पहुंचा था। पता चला कि सूबेदार सुरिन्दर विर्क के  बेटा हुआ है। विर्क तो मारे खुशी के बल्लियों उछल रहा था। खाना भी शायद ढंग से नहीं खाया था। अपनी बीबी हरप्रीत की फोटो को चांदी सी बिछी बर्फ पर लेटकर खूब चूमा था उसनें। मैं भी वहीं था। विर्क ने कहा...ओए...ढिल्लो..तू ताया बन गया है...ताया...। मुझे गले से लगाया और बर्फ पर गिरा दिया। फिर मेरा हाथ पकड़ कर बैठ गया। चंद सेकेंड की खामोशी के बाद ही एक सिसकती हुई आवाज के साथ विर्क के आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मैंने पूछा ओए...विर्क...ये क्या...तू रो रहा है...अरे आज तो जश्न की रात है। विर्क कुछ नहीं बोला। फिर मेरे कंधे को बहुत ही तेजी से पकड़ कर बोला...ढिल्लो...पता नहीं मैं अपने बेटे को देख पाऊंगा भी या नहीं...मैंने तुरंत ही उसका मुंह दबाते हुए कहा...ऐसा न बोल। चंद रोज में जंग खत्म हो जाएगा। हम सब वापस अपने घर चलेंगे। फिर तूं अपने गांव में एक अच्छी सी पार्टी देना। मेरी बातों को सुनकर विर्क हंसा और बोला...ढिल्लो तुझे तो पता ही है क्या हालात हैं। हमारी ब्रिगेड के कई जवान चीनी सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो चुके हैं। उसने नाम बताया...वो...वो...सुखबीर...याद है...चार महीने पहले ही तो शादी हुई थी उसकी...चीनियों ने मार दिया। उसकी बीबी को तो पता भी नहीं होगा शायद। बस इसी का डर है...क्या होगा मेरी बीबी और बच्चे का...मैने कहा तू फिक्र न कर...भारत सरकार ने पंजाब और राजस्थान से कुछ और सेना की टुकडिय़ों को इस इलाके में भेज दिया है। हम लोग ज्यादा हो जाएंगे और चीनियों को मार भगाएंगे। लेकिन उसके दिल में न जाने कैसी उलझन हो रही थी...बोला...पता नहीं मेरा बेटा कैसा होगा...मुझ पर गया होगा या प्रीत पर...। बस जल्दी से युद्ध खत्म हो और मैं अपने घर जाऊं...अपने काके को देखने का बहुत जी कर रहा है।  मंैने उसे बहुत समझाया।
आधी रात बीत चुकी थी। संदेश मिला कि सेलापास के आगे डोएनारा इलाके में चीनी सैनिकों ने फिर से हमला कर दिया। आप लोग फौरन मोर्चा संभालो। मैं तो वायरलेस पर था ही। विर्क  अवनी ब्रिगेड के साथ मोर्चे पर पहुंच गया। युद्ध हुआ। ब्रिगेड के ज्यादातर लोग मारे गए। विर्क भी उनमें से एक था।
आज पचास साल हो गए हैं इस बात को। विर्क का बेटा भी पचास साल का हो गया है। अब कनाडा में सेटल है।  कभी कभार ही आता है इंडिया। सुना है कोई बड़ा बिजनेस करता है। मेरी उम्र भी ८३ साल के करीब है। सुना है कि विर्क की शहादत की खबर उसकी पत्नी नहीं बर्दाश्त कर पाई थी। कुछ दिन बाद ही चल बसी थी। उसके बेटे को उसकी मासी ने पाला था। जो बाद में उसको लेकर कनाडा चली गई थी। १९६२ में हुए भारत-चीन के युद्ध की बातें आज भी जख्मों को हरा कर देती हैं। अगर हमारी सरकार पहले से मुस्तैद होती तो शायद विर्क और उसके जैसे अनगिनत शहीद हुए जवान अपने परिवार को खुशियां दे रहे होते।
(१९६२ में हुए भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर ढिल्लो तवांग इलाके में तैनात थे। उनसे बातचीत पर आधारित )

Tuesday, October 16, 2012

...स्वातघाटी के हर घर में है मलाला

उसको देखने के बाद लगा कि शायद असली गुलाबी रंग ऐसा ही होता है। कभी घर से बाहर कदम न रखने वाली नाजनीन जब पहली बार चंडीगढ़ आई तो उसकी बड़ी बड़ी आंखों में मैंने समंदर से सपने पलते लेते देखे थे। पता नहीं उनके सपनों को पंख लगे भी होंगे या यूं ही कहीं फडफ़ड़ा कर दफन हो गए होंगे उस स्वात घाटी में जहां से वह आई थी।
नाजनीन स्वात घाटी से अपने दो भाईयों खुदाबक्श और शाहिद के साथ २००९ में चंंडीगढ़ में लगे एक ट्रेड फेयर में आई थी। बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़ी बहुत यादे अभी भी जेहन में हैं नाजनीन, खुदाबक्श और शाहिद से हुई मुलाकात की। नाजनीन की तमन्ना थी कि वह अपने अब्बू और भाईयों के हाथों से बनाई जाने वाली शालों के बिजनेस को नया मुकाम दे। लेकिन उसको एक डर हमेशा बना रहता था कि ऐसा हो नहीं सकता। क्योंकि स्वातघाटी में लड़कियों की पढ़ाई सबसे बड़ा जुर्म है, और बगैर पढ़े बिजनेस को बढ़ाया नहीं जा सकता। जो भाईयों ने पढ़ा था बस उससे ही सीखती थी नाजनीन। नाजनीन ने बताया था कि स्वातघाटी में तालिबानियों के गढ़ पियूचार कस्बे से ही तमाम बंदिशो के संदेश रेडियो पर आते रहते हैं। मुझे याद है उसने यही शब्द कहे थे...मैं अपने अब्बू और भाईयों का हाथ बंटाने के लिए पढूंगी चाहे जो हो जाए...अगर मैं घाटी से निकल कर चंडीगढ़ आ सकती हूं तो मैं वहां पढ़ भी सकती हूं...गजब का कांफीडेंस था उसमें।
अभी कुछ दिन पहले पता चला कि वहां की ऐसी ही एक चौदह साल की लड़की मलाला को तालिबानियों ने गोली मार दी। क्योंकि वह वहां की लड़कियों को पढ़ाने के लिए आगे आ रही थी। मलाला की घटना से मुझे नाजनीन की याद आ गई...पता नहीं उसके सपने सच हुए होंगे या वह भी अभागी मलाला बन चुकी होगी।



Monday, July 23, 2012

भेड़ बकरियों की तरह नहीं, यहां तसल्ली से देखेंगे डॉक्टर साहेब...


अवस्थी...शायद यही सर नेम था उस सिक्योरिटी गार्ड का। जब मैंने अपनी दादी मां को डॉक्टर से दिखलाने के लिए उसको पचास रुपये की घूस दी थी। वह फौरन अंदर गया और चंद मिनट बाद डॉक्टर को कार तक ले आया। जहां मेरी दादी मां बेसुध पड़ी थी। डॉक्टर ने देखा और कहा कि क्लॉटिंग ज्यादा हो गई है। उम्र बहुत ज्यादा है सर्जरी नहीं हो सकती। ऐसा करो...आप, बाहर नीलकंठ मेडिकल स्टोर है, वहा से एक महीने की दवाएं ले जाओ और फिर दिखा लेना।
मैं अपने पिता जी और एक दो अन्य रिश्तेदारों के साथ दवा लेकर वापस अपने कस्बे की ओर दादी को लेकर चल पड़ा। आज से तकरीबन बारह साल पहले मेरी दादी को ब्रेनस्ट्रोक हुआ था। मेरे कस्बे में तो कोई डॉक्टर था नहीं सो पास के सबसे बड़े शहर लखनऊ ही लेकर आना एक रास्ता बचता था। लखनऊ तो दादी मां को लेकर चल दिए लेकिन यह नहीं पता था कि दिखाना किसे है। किसी ने बातचीत में किंगजाार्ज मेडिकल कॉलेज के एक बड़े नामी गिरामी न्यूरो फिजीशियन का नाम बताया था। पहु़च गए उनके दरवाजे पर। लंबी लाइन। सैकडा़ें मरीज। दरवाजे पर एक बंदूकधारी सुरक्षा गार्ड...वही अवस्थी जी...। भीड़ देखकर लगा कि इलाज यहां भी करा पाना बहुत मुश्किल है। एक घंटा...दो घंटा...तीन...चार...जब शाम होने लगी तो मैने वहां खड़े सिक्योरिटी गार्ड से धीरे से पूछा...क्या कोई गुंजाईश है कि डॉक्टर साहब बाहर आकर मेरी दादी मां को देख सकें...वह पिछले चार घंटे से कार में लाचार पड़ी हैं। उसने पहले मेरी ओर देखा...फिर उस कार की ओर जिसमें दादी अचेतावस्था में पड़ी थी...थोड़ा सोच विचार कर मुझे किनारे ले गया और धीरे से कहा कि कुछ चाय पानी कराओंगे...मुझे लगा कि अब रास्ता मिल गया है। शायद मेरी दादी को डॉक्टर साहब देख लें..अवस्थी जी को पचास का नोट थमाया और अवस्थी जी डॉक्टर साहब के कमरे में....। थोड़ी देर में देखा कि छोटे कद के एक मोटे से डॉक्टर साहब आला लेकर कार के पास आ गए। खैर...मेरी दादी का इलाज उन डॉक्टर साहब के पास बहुत दिनों तक चला लेकिन वह मेरी दादी को नहीं बचा सके। इतने दिनों में अवस्थी जी ने दुनिया में काम कराने का एक तरीका जरूर सिखा दिया था।
समय करवट बदलने लगा। मैं पढ़ाई करने के लिए लखनऊ पहुंच गया। हिन्दुस्तान अखबार में बगैर पैसे के काम करने वाला स्ट्रिंगर बन गया। मेरे एक बड़े भाई समान सहयोगी मिले तो उनके साथ हेल्थ बीट में काम करने के लिए मेडिकल कॉलेज जाने लगा। वहां पर उन डॉक्टर साहब से भी मुलाकात होने लगी जिनके सिक्योरिटी गार्ड को पचास रुपये देकर में अपनी दादी को दिखाने जाता था।
समय थोड़ा और तेज चला। मैं लखनऊ के रास्ते चंडीगढ़ अमर उजाला आ गया। हेल्थ बीट में काम करने का मौका मिला। पीजीआई जैसे देश क्या पूरी दुनिया के सबसे बेहतरीन अस्पताल में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। उसी दैरान मेरे पीजीआई के एक बहुत करीबी हो चुके डॉक्टर दोस्त कम अंकल को इंडियन एसोसिएशन ऑफ न्यूरोलॉजी का प्रेसीडेंट बनाया गया। मैं उनके दफ्तर में बैठा था। तभी देखा कि कमरे के दरवाजे से एक मोटे से छोटे कद के एक डॉक्टर साहब अंदर घुसे। एक बारगी तो मैं उनको पहचान ही नहीं पाया...लेकिन दिमाग पर जोर डाला तो पाया कि यह तो लखनऊ वाले डॉक्टर साहब हैं। जिनके पास मैं अपनी दादी मां को लेकर जाया करता था। एैनीवे...बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ...पीजीआई वाले डॉक्टर साहब ने मेरा परिचय कराया और उनसे बातचीत शुरू हुई। तब पता चला कि कल से पीजीआई में शुरू होने वाले एथिक्स इन मेडिकल प्रैक्टिस के नेशनल सेमिनार में उक्त डॉक्टर साहब मुख्य वक्ता के तौर पर बोलने आए हैं। ...लखनऊ वाले डॉक्टर साहब पीजीआई के डॉक्टर साहब से अपने कल के होने वाले डिस्कशन के मुख्य बिंदुओं पर चरचा कर रहे थे...वह बार बार इस बात पर जोर दे रहे थे कि सरकार द्वारा मिलने वाला नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस (प्राइवेट इलाज न करने पर सरकार द्वारा दिए जाने वाले वाला भत्ता ) अब और बढऩा चाहिए। मुझे उनकी इन बातों को सुनकर अपनी दादी मां की झुर्रियों वाला वह चेहरा याद आ रहा था कि मेडिकल कॉलेज के सरकारी डॉक्टर के घर में कैसे घंटों पड़े रहने के बाद इलाज होता था। आज भी याद है वह शब्द...जब सिक्योरिटी गार्ड कहता था...डॉक्टर साहब अभी तो मेडिकल कॉलेज से आए हैं...थोड़ा इंतजार करो...बहुत सही जगह आए हो...अस्पताज में तो भेड़ बकरियों की तरह भीड़ हाती है...घर पर तो बहुत तसल्ली से देखेंगे...
:(    

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