Wednesday, June 22, 2011

कंपनी वाले भगवान...

पेरिस वाली आंटी को गणेश जी देना है तो किसी अच्छी कंपनी वाले गणेश जी लेना...वो दिखने में एकदम गणेश जी लगते हैं...मेरी भाभी जी ने मुझे लखनऊ से फोन करके यही कहा।
दरअसल मेरी एक बहुत करीबी महिला मित्र हैं, उनकी उम्र पचास साल के आस पास है इसलिए उनको में आंटी कहता हूूं। मूलत: पेरिस की रहने वाली हैं और हमारे एक घरेलू कार्यक्रम में शरीक होने लखनऊ पहुंची थी। उनका कार्यक्रम मेरे साथ इसी सोलह जून को वापसी में चंडीगढ़ भी आने का बना। चूंकि बड़े दिनों बाद वह मेरे पास चंडीगढ़ आ रहीं थी इसलिए मैंने सोचा कि उनको भगवान गणेश जी की प्रतिमा भेंट करूं।
खैर, भगवान विदेश जा रहे थे...दुनिया के सबसे फैशनेबल शहर में वह किसी के घर में बने गिरिजाघर में विराजेंगे सो मेंने भी सोचा कि कंपनी के भगवान ही बेहतर हैं। चूंकि मेरी भाभी जी ने कहा था गणेश जी कंपनी के लेना इसलिए मेरा रुझान इस ओर कुछ और भी बढ़ गया था। मैं सेक्टर सत्रह की एक गिफ्ट शॉप पर चला गया। वहां पहुंचा तो देखा तमाम कंपनियों के भगवान हैं। जो अच्छी कंपनी और ज्यादा कीमत वाले भगवान थे उनके  फीचर्स ज्यादा शार्प थे और जो जरा हल्की फुल्की कंपनी के थे उनके फीचर्स कुछ कुछ ठीक टाइप के थे या यूं कहलें कि काम चलाऊ थे...और जो लोकल टाइप की कंपनी के भगवान थे उनके  तो कोई फीचर्स ही नहीं थे। दुकानदार का कहना था कि लोकल कंपनी वाले माल में शकल पर मत जाओ...श्रृद्धा को देखो और जो जिस भगवान को लेना चाहते हो उसका नाम लेकर कोई सा भी आंख बंद करके खरीद लो...।
इतना सब देखने के बाद तो दिमाग में आया कि भगवान तो कंपनी के ही लेने में फायदा हैं। वरना क्या फायदा लोकल कंपनी के भगवान ले जाऊं और फिर घर में यह सिद्ध करता घूमूं कि...भई जो में लाया हूं वह गणेश भगवान ही हैं। खैर मैनें ब्रांडेड  कंपनी के रुमार्ट वाले गणेश जी को पसंद कर ही लिया। उनकी पैकिंग करवाई...और अपनी गाडी में आ गया...कार की जैसे ही चाबी ऐंठी तो एफएम पर प्रदीप जी का बड़ा पुराना एक गीत आ रहा था...चांद न बदला, सूरज न बदला न बदला ये आसमान, कितना बदल गया इंसान...देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान...कितना बदल गया इंसान...मैं भी इस गाने का आनंद उठाता हुआ धीरे धीरे अपने घर की ओर चल दिया...।

Sunday, March 27, 2011

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन-२


तकरीबन सात साल बाद मैं इस बार होली पर अपने गांव गया था। लोगों से मिला लेकिन उनसे मिलने में मुझे कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। मेरा तो मन बार बार उस घर को देखने का कर रहा था जहां पर बचपन के दिन बिताए थे। मैं अपने गांव के घर में तकरीबन २२ साल बाद जाने वाला था।

रह रह कर बस मन में एक ही बात आ रही थी कि...पता नहीं घर कैसा होगा...घर के पास में खड़ा वह पीपल का पेड़ क्या अभी भी होगा या नहीं...मुझे याद आ रहा था कि मेरे घर के आंगन में पीपल के पत्ते खूब उड़-उड़ कर गिरते रहते थे। जिसको मेरी दादी मां हर रोज सुबह और शाम को झाड़ू से साफ किया करती थी। मेरे घर के बाहर और पीपल के पेड़ के नीचे एक मंदिर होता था। उस मंदिर के चबूतरे पर मैं एक लाल रंग की छोटी सी साइकिल चलाता था। गांव में घर था सो खूब बड़ा था। घर के पीछे अमरूद और शरीफा का पेड़ लगा था। मुझे तो बस यही दो पेड़ याद हैं, शायद थे कुछ और भी। आंगन के एक कोने में नल लगा था...मुझे याद है मेरी दादी मां मुझे जबरदस्ती पकड़ कर इसी नल के चबूतरे पर नहलाया करती थी और मैं नहाने के नाम पर रोता भी खूब था। खैर...और भी बहुत कुछ आंखों के सामने घूम रहा था...। मैं गांव में अपने चाचा के घर बैठ कर यह सब सोच ही रहा था कि तभी आवाज आई...चलो घर देखने चलते हैं।

जैसे घर के सामने पहुंचा...तो यकीन मानिए चंद सेकेंड के लिए एक बारगी मेरी आंखे नम हो गई। यहीं वह घर हैं जहां पर मैंने बचपन गुजारा था...मेरे पिता जी ने शहर में घर बनवाने के बाद इस गांव के घर को किसी परिचित को मुफ्त में दिया था। मुफ्त में घर देने की मंशा यही थी कि कम से कम घर तो बना रहेगा। वरना खाली पड़े घर का क्या होता। कुछ दिन बाद खंडहर ही हो जाता। खैर...मैं अपने घर के दरवाजे की ओर बढ़ा। सब कुछ बदल गया...अब न तो वह घर जैसा घर रहा...और न वह लंबा चौड़ा घर का द्वार। घर के पास में लगा पीपल का पेड़ बूढ़ा हो चुका था। अब न तो उसकी लंबी-लंबी डालियां बची थी और न ही उसके पत्ते। मैने उस मकान में रहने वाले चाचा से कहा कि अंदर देख सकता हूं...उन्होंने जैसे कहा हां हां आओ बेटा...आपका ही घर है...तो लगा कि मुझे बहुत कुछ मिलने वाला है...जिसकी मुझे तलाश थी। अंदर पहुंचते ही देखा कि अब वह बरोठे (बैठक, ड्राइंगरूम) की रौनक गायब हो चुकी थी। बरोठे में लगा लकड़ी का दरवाजा वही सालों पुराना था लेकिन दीवारे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थीं। आंगन में निकलते ही सामने रसोई हुआ करती थी मुझे वह भी दिखी नहीं...मेरी निगाहें बार बार उस आंगन में लगे नल को खोज रही थी जहां से मैं हमेशा नहाने के नाम पर भाग जाया गरता था, कहीं नहीं दिखा। नल शायद अपना अस्तित्व खो चुका था। मैंने अपने पुराने घर में रहने वालों से पूछा कि अब पीपल के पत्ते तो नहीं गिरते हैं...तो उनका जवाब था...कहां...अब तो पेड़ ही देखो सूखने लगा है। घर के पीछे पहुंचा देखा कि वहां न तो शरीफे का पेड़ था और न ही अमरूद का। पूछने पर पता चला कि मकान को थोड़ा और पीछे बनाना था सो नींव की भेंट चढ़ गए दोनों पेड़।

बड़ा ही उजड़ा उजड़ा सा लगा...जो सोचा था वैसा कुछ भी नहीं रहा वहां पर। सब कुछ आधुनिकता की भेंट चढ़ गया। पास के मंदिर में शायद ताला पड़ गया था। कोई विवाद की वजह बताई गई।

शाम ज्यादा होने लगी थी...कुछ और लोगों से मिलकर वापस जाना था...सो पिता जी ने कहा कि चलो अब चलते हैं। कार की चाबी घुमाई और पल भर में अपने उस घर के सामने से इस तरह से काफूर हो गया मानों लगा हो कि यह तो सिर्फ सपना था...बार बार सच्चई को झुठलाने की कोशिश कर रहा था कि शायद अभी भी अपना घर एकदम वैसा ही होगा जैसा मैने बचपन में छोड़ा था...लेकिन ऐसा था नहीं...गांव बदल गए...घर बदल गए...गांवों की अब हवाएं भी बदल गई...बदलें भी क्यों न...क्योंकि अब हवा देने वाले वह पीपल के पेड़ भी तो जाने को आतुर हैं।

Saturday, February 26, 2011

वो दिन कहां से लाऊं...पार्ट-१

काम करने के बाद रात को दफ्तर से घर लौट रहा था। रात दस-सवा दस बजे के बाद अक्सर सुनसान हो जाने वाली चंडीगढ़ की चौड़ी सड़कों पर घर तक सुकून से पहुुचने का एक ही जरिया था...एफएम। कार का एफएम ऑन कर दिया। उसमें कुछ बहुत ही पुराने किस्से सुनाए जा रहे थे। ऐसे किस्से जो रात के अंधेरे में सुनने के बाद एक बारगी हर शख्स अपने पुराने दिनों में पहुचाने को मजबूर कर दें। मैं भी उन यादों के झरोखे में पहुंच गया जो बरसों पहले एक छोटे से कस्बे में बना था। घर पहुंचते ही सबसे पहले मै यादों के पिटारे से कुछ निकालने लगा...जो निकला उसको आपकी खातिर कुछ यूं लिख दिया...। 
 मेरी उम्र यही कोई आठ या नौ साल की थी। मैं अपनी बहन (जो मुझसे छोटी है) के साथ छत पर बैठा था। चार बजने को थे। यकीन मानिए हमेशा चार बजने के समय 0मैं यही सोचता था...काश...ये चार न बजा करें। सीधे तीन बजने के बाद पांच बज जाया करें। दरअसल चार बजे मेरे एक टीचर घर पर ट्यूशन पढ़ाने आते थे। और मैं हमेशा बोरिंग और डांट खाने वाली ट्यूशन से बचने की कोशिश करता था। 
खैर साइकिल की घंटी बजी। घंटी की आवाज सुनी और छत पर से अपने घर के आस पास खाली पड़े मैदान में लाचार होकर उन बच्चों को देखा जो मस्त होकर खेल रहे थे...और मैं...बैग उठाऊंगा और पढऩे जाऊंगा। बड़ी ही जलन हुई उनको देखकर। लेकिन नीचे आया। मेरी बहन भी मेरे साथ ही ट्यूशन पढ़ती थी। मैने उससे कहा...तुम पहले जाओ...मैं आता हूं। वह चली गई और मै अपना बैग उठाने के बहाने अपने कमरे में घुस गया। जी तो करता नहीं था ट्यूशन पढऩे का इसलिए सोचा कुछ देर और लग जाए तो कम से पांच जल्दी बज जाएंगे। लेकिन हमेशा की तरह मेरी मंशा को भांप मेरे टीचर ने आवाज लगाई...आशीष कहां हो...आना नहीं है क्या। मैंने कहा...आ रहा हूं सर। एक कुर्सी खाली थी। सामने आचार्य जी और एक कुर्सी पर मेरी बहन बैठी पढ़ रही थी। मैने कॉपी निकाली और किताबें। होमवर्क चेक कराया। जो नहीं किया था उसके लिए हमेशा की तरह लंबी डांट पड़ी। बहाने भी वहीं पुराने वाले बनाए कि...सर स्कूल में काम ज्यादा मिला थाए इसलिए होमवर्क नहीं किया...मम्मी के साथ बाजार चला गया था...रात को जल्दी सो गया था...या पेट में दर्द हो रहा था...वगैरा...वगैरा...। बावजूद इसके पिटाई मेरी हो ही जाती थी। 
खैर, जहां पर मैं बैठता था मुझे याद है सामने की दीवार पर घड़ी लगी हुई थी। मैं हमेशा अपने टीचर की नजरों से बचते हुए उसकी ओर निगाहे दौड़ा ही लेता था। और देखता था कि बड़ी वाली सुई कहां पर है। सुकून तब मिलने लगता था जब बड़ी (मिनट वाली सुई) सुई नौ के करीब पहुंच जाती थी। मुझे लगता था कि ...बस...अब जल्द ही छूटने वाला हूं। जैसे ही मेरे टीचर होमवर्क देना शुरू करते थे तो मुझे लगता था...चलो...बंधन से मुक्ति मिली...और उनके जाने के बाद सीधे मैदान पर। उस जुनून के साथ जैसे कोई अभी आजाद हुआ हो...।

  यादों के झरोखे से फिलहाल इतना ही...क्योंकि लिखते लिखते काफी समय लग गया। शायद सवा बारह बजने को हैं। और आज मैंने अपना फेवरेट तारक मेहता का उल्टा चश्मा भी नहीं देखा। पत्नी की आवाज आती है...चलो अब खाना भी खा लिया जाए...मैं उठता हूं...और हाथ धोने से लेकर खाने की टेबल तक आने में मुझे कई बार उसी साइकिल की घंटी की आवाज सुनाई देती है। जिसको सुनकर मैं हमेशा सोचता था...काश तीन बजने के बाद पांच बजा करें...।  क्रमश: ...

Saturday, November 27, 2010

भैया...ये तो डाउन मार्केट है!

रात को टीवी पर शोले मूवी देख रहा था। बीच में ब्रेक हुआ तो चैनल बदलने लगा। चैनल बदलते बदलते एनडीटीवी पर रवीश की रिपोर्ट कार्यक्रम आ रहा था। देखने लगा। गढ़मुक्तेश्वर के किसी मेले पर आधारित थी ये रिपोर्ट। कार्यक्रम अच्छा लगा तो मूवी का इरादा छोड़ कर उसे देखने लगा। कार्यक्रम खत्म होने के बाद फिर शोले मूवी देखी और सो गया। सुबह उठा। अपना अखबार उठाया तो पन्ना पलटते पलटते एडिटोरियल पेज पर पहुच गया। देखा वहां पर रवीश कुमार का एक लेख सोसाइटी में मोहल्ला लिखा हुआ था। उसको पढ़ा। अच्छा लगा। खैर, अमूमन सभी न्यूज पेपर पढऩे के बाद मार्निंग मीटिंग के लिए ऑफिस पहुंचा। चूंकि रविवार था और लगभग सभी सरकारी कार्यालय बंद होते हैं, इसलिए रोज की तरह जल्दी भागना नहीं था सो कुछ साथियों से अपने अखबार के एडिटोरियल पेज की तारीफ करने लगा। खासकर रवीश कुमार के लिखे गए सरोकार कॉलम का। मैनें अपने एक साथी को रात वाली रवीश की रिपोर्ट का भी जिक्र किया। मैंने कहा कि उस रिपोर्ट ऐसे मेले का जिक्र था जो एकदम अपने गांव जैसा मेला था। जिसको देखे मुझे तो कम से कम दस साल हो गए हैं। इसलिए पूरा कार्यक्रम देखा और पुराने दिनों में कुछ पल के लिए खो भी गया। जिस अखबार में काम करता हूं उसके उसके एडिटोरियल पेज पर रवीश कुमार का सोसाइटी में मोहल्ला भी आज की व्यथा और कथा कहता हुआ सामयिक कॉलम हैं, इसलिए पसंद आया। मैं अपने जिन साथी से चरचा कर रहा था वह भी ऐसे सरोकारों से प्रेरित रिपोर्ट्स और कॉलम में सहमति जता रहे थे।
तभी हमारे एक अन्य साथी जो इस बातचीत के दौरान का हिस्सा थे बोल पड़े...क्या एनडीटीवी डाउन मार्केट रिपोर्ट देता है। रवीश कुमार क्या डाउन मार्केट पर ही लिखते हैं? वह कहने लगे कि ये मेला...बैलगाड़ी...गंदे बच्चे...गंवई अंदाज...गंवई गाने...गांव की कच्ची सड़के, मोहल्ले का कांसेप्ट और न जाने क्या क्या गिनाने लगे। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोले भैया...ये सब तो डाउन मार्केट है। देखो न...अब कौन पूछता है इनको। इनके दम पर टीआरपी और रीडरशिप नहीं बढ़ती। कुछ बेचना है तो हॉट बेचो। सनसनी बेचो। तुक्के बेचो। हाई सोसाइटी को ध्यान मे रखकर बेचो। सबको ऐसी सोसाइटी तक अपनी पैठ बनानी है। इसलिए ये डाउन मार्केट वाली खबरों और रिपोर्ट्स से कुछ नहीं होने वाला।
खैर मैने उनकी बातें सुनी...और उनकी बात से कुछ हद तक सहमति भी जताई। मैं एनडीटीवी का मुरीद नहीं हूं और उसकी वकालत भी नहीं करता इसलिए मुझे नहीं मालूम कि रवीश की रिपोर्ट और उनके जैसे अन्य टीवी कार्यक्रमों की टीआरपी क्या है...मुझे इसका कतई इल्म नहीं है कि अखबार के एडिटोरियल में लिखे ऐसे लेख को पढऩे के बाद कितने लोगों ने वाह कहा होगा और कितनों ने डाउन मार्केट कहते हुए आगे का पन्ना पलट दिया होगो...लेकिन मुझे इतना जरूर मालूम है ऐसी डाउन मार्केट रिपोर्ट्स और कॉलम दिल को उस अपनेपन का अहसास जरूर दिला जाते हैं जिसे कभी आपने बचपन में महसूस किया था। जिसे हम डाउन मार्केट रिपोर्ट कहते हैं शायद उसको हमारे और आपके बुजुर्गों ने भी महसूस किया होगा।

Saturday, November 13, 2010

मिस्टर प्रेसीडेंट...हम निपट लेंगे

हम निपट लेंगे पा·िस्तान से। हमें निपटने ·े लिए ·िसी ·ी मदद ·ी जरूरत नही है। ले·िन जिस तरह से अमेरि·ी राष्ट्रपति बरा· ओबामा ·ी इंडिया विजिट ·े दौरान मीडिया ने तमाशा बनाया वह अमेरि·ी राष्ट्रपति ·े सामने ना· रगडऩे से ·म नहीं था।
हर टीवी चैनल पर सिर्फ ए· ही सवाल...आखिर अमेरि·ा पा·िस्तान ·े लिए साफ साफ शब्दों में ·ुछ क्यों नहीं ·हता। क्यों नहीं पा·िस्तान ·ो वह आतं·ी देश घोषित ·र देता। बरा· ओबामा क्यों दलील दे रहे हैं ·ि दोनों देश मिल·र अपना मामला सुलझाएं...और भी बहुत से सवाल थे जो मीडिया रह रह ·र बरा· ओबामा ·ी विजिट ·े दौरान उठा रहा था। सवाल उठता है ·ि इतना सब ·ुछ ·रने ·े बाद मिला क्या। इसलिए क्या जरूरी था यह सब ·रना। और अगर ·िया भी तो ओबामा ने पा·िस्तान ·ो क्या ·ह दिया। चलो मान लें ·ुछ आतं·ी ठि·ानों ·े बारे में ·ह भी दिया हो तो क्या हुआ। पा·िस्तान ·ो तो ·ुछ नहीं ·हा। फिर भी हम खुश हो लिए...ओबामा ने लगाई पा· ·ो झाड़...। ले·िन जनाब...न पा·िस्तान बदला और न ही उस·ी ·रतूत। फिर क्यों हम लोग तीन दिनों त·...ओबाम आए क्या लाए...ओबामा आए क्या लाए से ले·र पा·िस्तान पर अमेरि·ी टिप्पणी ·ा सवाल उठा रहे थे।

सोचने ·ी बात है अगर बरा· ओबामा भारत ·ी धरती पर आए थे तो हम·ो यह गफलत पालनी ही नहीं थी ·ि वह पा·िस्तान ·ो भारत में पहुंचने ·े बाद आतं·ी राष्ट्र घोषित ·रेंगे। ऐसा हुआ भी नहीं। दूसरी बात मीडिया से ले·र हर शख्स ·ो समझनी चाहिए थी ·ि जो अमेरि·ा पा·िस्तान ·ी जमीन ·ा इस्तेमाल युद्ध ·े लिए ·रता हो वह अपने पैरों पर ·ुल्हाड़ी इतनी जल्दी क्यों मार लेगा। तीसरी बात और सबसे अहम बात जो है वह यह है ·ि अमेरि·ा ·ी बिगड़ती अर्थव्यवस्था ·ो सुधारना वहां ·े राष्ट्रपति ·े लिए चुनौती बना है। दुनिया में बादशाहत बर·रार रखने ·े लिए चौधरीपना जरूरी है ले·िन यह तभी हो स·ेगा जब आप अपने देश में मजबूत होंगे। सो उन·ा मुख्य म·सद दोनों देशों ·े बीच व्खपारि· रिश्तों पर जमी हुई और जम रही धूल ·ो साफ ·रने आए थे। मालूम होना चाहिए ·ि अपनी एशिया विजिट से ए· रोल पहले बरा· ओबामा ने व्हाइट हाउस से ही बेरोजगारों ·े लिए रि·्रूटमेंट पर नजर त· रखने ·ी व्यवस्था ·ी थी। हम लोगों ·ो मान·र चलना चाहिए ·ि पा· से निपटने ·े लिए ·िसी ·ी मदद ·ी जरूरत नहीं है। यह बात हमारे साथ साथ पा·िस्तान ·ो भी मालूम है।

Monday, July 5, 2010

ये देखिए...धोनी की शादी के जूठे पत्तल

नमस्कार मैं हूं आशीष...और आप देख रहे हैं फलां चैनल...आइये आपको लेकर चलते हैं उस बारात में जहां पर हमको कल घुसने नहीं दिया गया। लेकिन अपने दर्शकों के खातिर हम पड़े रहे वहां पर...और महेंद्र सिंह धोनी की शादी के बाद लेकर आए हैं आपके लिए एक्स्क्लूसिव तस्वीरें। वे तस्वीरें जो सबसे पहले हमारे चैनल पर ही दिखाई देंगी। पेश है हमारे साथी प्रवीण पाण्डेय की खास रपट (उजड़े हुए मंडप से)।

यह देखिए...आपका पसंदीदा चैनल सबसे पहले पहुंचा धोनी के मंडप में। यही वह जगह हैं जहां पर धोनी ने सात फेरे लिए थे...यही वह जगह है जहां पर धोनी ने साक्षी सिंह रावत को अपना बनाया...ये वही गलियारा है जहां से धोनी निकले थे...देखिए...देखिए...सबसे पहली तस्वीर आपकी स्क्रीन पर...धोनी की घोड़ी के पांव के निशान...जो अभी भी ताजे हैं। ये देखिए वह कुर्सियां....जिन पर यहां आए अतिविशिष्टï साठ मेहमानों ने तशरीफ रखी थी। मैं अपने कैमरामैन पवन धीमान से चाहूंगा कि कैमरे का फोकस उधर भी करें जहां पर रात भर कल हमलोग घुसने के लिए जोर आजमाईश करते रहे लेकिन घुसना तो दूर यहां तक फटकने भी नहीं दिया गया। चलिए अब चलते हैं उस ओर जहां पर भोजन की व्यवस्था थी...ये देखिए जूठे पत्तल...देखिए इसमें सब्जी भी लगी हुई है...उधर देखिए...खा कर फेकी गई रसमलाई...झींगें की टांगें भी इधर उधर पड़ी दिख रही हैं। यह वही जगह है जहां पर कल शहनाई बज रही थी। मैं उन दर्शकों को बताना चाहूंगा जिन लोगों ने अभी अभी अपना टीवी सेट ऑन किया है...ये वह तस्वीरें हैं जहां धोनी की शादी हुई थी...आप लोगों बताना चाहूंगा कि फलां चैनल सबसे पहले आपके लिए लाया है ऐसी एक्स्क्लूसिव तस्वीरें। खबर हर कीमत पर...सबसे तेज...आपको रखे आगे...सच जो हम दिखाएं...बोलती तस्वीरे...।

तभी वहां जूठे पत्तल हटाने वाला अरविन्द रावत मिल गया। मैं फिर चालू हो गया...आइये आपको मिलवाते हैं उस चश्मदीद गवाह से जो धोनी और साक्षी की शादी का साक्षी बना। क्या नाम है आपका...अरविन्द रावत...यहां क्या¢ कर रहे हो...जी जूठे पत्तल हटा रहा हूं...कल आप थे शादी में...हां जी था...क्या देखा आपने शादी में...जी दोनों लोगों की शादी हो गई...यह बताइये धोनी ने घोड़ी से उतरते वक्त अपना बायां पैर जमीन पर रखा था या दाहिना...धोनी की शादी में व्यंजन कैसे थे...जी बहुत अच्छे थे...आपने चखे थे...हां जी खाया था...देखिए...ये लकी रावत जी हैं जिन्होंने धोनी की शादी में खाना भी¢ खाया था(मैंने रात में लक्ष्मी कंपनी की नमकीन और दो बार चाय पी ही थी )खैर...अच्छा धन्यवाद...।

यह थे चश्मदीद रावत जी...जो हमको बता रहे थे शादी का आंखों देखा हाल...

आप ने देखा धोनी की शादी की एक्स्क्लूसिव तस्वीरें।

फिलहाल हम लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक...आप बने रहिए हमारे साथ...कुछ और ताजा तरीन तस्वीरों के साथ...

मुझे लगता है हमारे टीवी के भाई धोनी के श्रीलंका दौरे के बाद होने वाले हनीमून की भी ऐसी ही कवरेज करेंगे। अगर ऐसी कवरेज हुई...तो खुदा खैर करें...क्या क्या दिखाएंगे और बताएंगे। तौबा..तौबा...तैबा...