Monday, July 5, 2010
Sunday, June 27, 2010
रात, अंधेरा, भूत और खौफ
एक हमारे साथी हैं। बहुत ही सज्जन हैंं। उनकी खास बात यह है कि वह अपनी एक सबसे बड़ी कमजोरी को सबके सामने मुस्कुराते हुए बता देते हैं। दरअसल वह रात को डरते बहुत हैं। डर की वजह भी बताते हैं। कहते हैं कि भाई साहब रात को भूत से डर लगता है। अकेले सो नहीं सकते।
इसी रविवार को मैं दफ्तर में लंच कर रहा था। तभी वह भी पहुंच गए। मैंनू पूंछा भई...क्या हाल है। कल रात को आप घर पर नहीं आए थे। तो उन्होंने बताया भाईसाहब मैं रात को अपने घर पर ही था। यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, पूछा और कौन था...उन्होंने थोड़ा गर्व से कहा कि...कोई नहीं...भाई साहब मैं अकेला ही था...मेरे मुंह से अचानक निकला...अरे नहीं...फिर...सोए कब थे...। बस फिर क्या था...उन सज्जन साथी ने फिर बड़ी विनम्रता से कहा...सोया कहां...रात भर जाग कर लैपटाप पर फिल्म देखी...अपने हिन्ूद रीति रिवाज के अनुसार प्रात: कालीन तीन बजे से भूत प्रेत और अन्य तमाम ऐसी विपदाएं अपने डेरे में चली जाती हैं। इसलिए उसके बाद डर लगना बंद हो गया और चद्दर तान कर सो गया। वैसे उसकेबाद हल्की रोशनी भी होने लगी थी।
एक बार की बात है यही सज्जन रात को डेस्क से काम करके करीब बारह बजे घर जा रहे थे। स्ट्रीट लाइट बंद थी सो रास्ते में अंधेरा था। बा फिर क्या था...भाई साहब को हनुमान जी याद आ गए। तुरंत हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया। रास्ते भर हनुमान चालीसा पढ़ी और जैसे तैसे घर पहुंचे। अगले दिन आपबीती भी सुनाई।
इसी रविवार को मैं दफ्तर में लंच कर रहा था। तभी वह भी पहुंच गए। मैंनू पूंछा भई...क्या हाल है। कल रात को आप घर पर नहीं आए थे। तो उन्होंने बताया भाईसाहब मैं रात को अपने घर पर ही था। यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ, पूछा और कौन था...उन्होंने थोड़ा गर्व से कहा कि...कोई नहीं...भाई साहब मैं अकेला ही था...मेरे मुंह से अचानक निकला...अरे नहीं...फिर...सोए कब थे...। बस फिर क्या था...उन सज्जन साथी ने फिर बड़ी विनम्रता से कहा...सोया कहां...रात भर जाग कर लैपटाप पर फिल्म देखी...अपने हिन्ूद रीति रिवाज के अनुसार प्रात: कालीन तीन बजे से भूत प्रेत और अन्य तमाम ऐसी विपदाएं अपने डेरे में चली जाती हैं। इसलिए उसके बाद डर लगना बंद हो गया और चद्दर तान कर सो गया। वैसे उसकेबाद हल्की रोशनी भी होने लगी थी।
एक बार की बात है यही सज्जन रात को डेस्क से काम करके करीब बारह बजे घर जा रहे थे। स्ट्रीट लाइट बंद थी सो रास्ते में अंधेरा था। बा फिर क्या था...भाई साहब को हनुमान जी याद आ गए। तुरंत हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया। रास्ते भर हनुमान चालीसा पढ़ी और जैसे तैसे घर पहुंचे। अगले दिन आपबीती भी सुनाई।
Saturday, May 22, 2010
मैं और मर्सिडीज एसयूवी की ड्राइविंग
बहुत ही अच्छा लगा जब मैं दुनिया की सबसे मंहगी एसयूवी में शुमार मर्सिडीज जीएल क्लास में चढ़ा। एक अजब की अनुभूति थी। क्योंकि यह एक तरह से फ्यूचर मशीन में बैठने जैसा था। हवाई जहाज में बैठने का अवसर खूब मिला लेकिन भारत में तकरीबन ढाई करोड़ रुपये में आने वाली मर्सिडीज जीएल क्लास में बैठना और उसे चलाना कुछ अलग ही था। छोटी छोटी ढेर सारी इतनी बटनें और तमाम तरह की स्क्रीन्स। समझ में ही नहीं आ रहा था कि हरी सिंह जी जो कि मुझको इस गाड़ी में सवारी का आनंद दिलानें के लिए बैठे थे कौन सी बटन दबाते ही कार के करतब दिखाने लगते थे। मैं करीब ४८ डिग्री की सीधी चढ़ाई वाली सड़क पर उस गाड़ी से चढऩे लगा तो अचानक हरी सिंह जी ने कार का ब्रेक छोड़ दिया। कहा देखो...कार फिर भी वापस पीछे नहीं आएगी। मैं हैरान था लेकिन ज्यादा नहीं क्योंकि कुछ दिन पहले मैंने मुंबई के अपने एक फिल्म अभिनेता दोस्त से इस सेगमेंट की किसी अन्य एसयूवी की यह खासियत सुनी थी कि इसमें पहाड़ पर चढऩे पर एक ऐसे मोड में गाड़ी डाल देते हैं जो बैक नहीं होती।
खैर...हरी सिंह ने सैर कराई। मुझसे भी ड्राइव करने को कहा...मै सेंट्रो चलाने वाला बंदा...मर्सिडीज...वह भी इतनी तकनीकियों से भरी पूरी ऊपर से इत्ती मंहगी...थोड़ा सा डर लग रहा था...लेकिन सिंह साहब नहीं माने...बोले...मिस्टर तिवाड़ी...प्लीज कम टू दि ड्राइविंग सीट...तभी पास में खड़े मर्सिडीज बेंज के जनरल मैनेजर (प्रोडक्ट मैनेजमेंट) मानस ने मेरा हाथ पकड़ा और ड्राइविंग सीट की ओर ले आए। अब गाड़ी की स्टेयरिंग हाथ में...और दिल में धक धक...खैर गाड़ी बढ़ी तो मुझे पता ही नहीं चला...कब ये रेंगने लगी। करीब पच्चीस से तीस सेकेंड के बाद यही कार मुझसे मानों उउऩे जैसी लगी हो। खाली मैदान में सवा सौ से ज्यादा की स्पीड...बहुत थी। वैसे मैं अपनी बीबी से चुराकर कभी कभार अपनी कार को सौ से ऊपर पहुंचा देता हूं लेकिन कहा न...सिर्फ कभी कभार....।
खैर...मर्सिडीज को हरी सिंह जी के सुपुर्द कर वापस ऑफिस की ओर निकल पड़ा...एक अलग अनुभव के साथ...। ठीक उसी वक्त मुझे वह दिन याद आ रहे थे जब मैं अपने बाबा के साथ बैलगाड़ी पर चढ़कर खेतों में जाया करता था...:)
खैर...हरी सिंह ने सैर कराई। मुझसे भी ड्राइव करने को कहा...मै सेंट्रो चलाने वाला बंदा...मर्सिडीज...वह भी इतनी तकनीकियों से भरी पूरी ऊपर से इत्ती मंहगी...थोड़ा सा डर लग रहा था...लेकिन सिंह साहब नहीं माने...बोले...मिस्टर तिवाड़ी...प्लीज कम टू दि ड्राइविंग सीट...तभी पास में खड़े मर्सिडीज बेंज के जनरल मैनेजर (प्रोडक्ट मैनेजमेंट) मानस ने मेरा हाथ पकड़ा और ड्राइविंग सीट की ओर ले आए। अब गाड़ी की स्टेयरिंग हाथ में...और दिल में धक धक...खैर गाड़ी बढ़ी तो मुझे पता ही नहीं चला...कब ये रेंगने लगी। करीब पच्चीस से तीस सेकेंड के बाद यही कार मुझसे मानों उउऩे जैसी लगी हो। खाली मैदान में सवा सौ से ज्यादा की स्पीड...बहुत थी। वैसे मैं अपनी बीबी से चुराकर कभी कभार अपनी कार को सौ से ऊपर पहुंचा देता हूं लेकिन कहा न...सिर्फ कभी कभार....।
खैर...मर्सिडीज को हरी सिंह जी के सुपुर्द कर वापस ऑफिस की ओर निकल पड़ा...एक अलग अनुभव के साथ...। ठीक उसी वक्त मुझे वह दिन याद आ रहे थे जब मैं अपने बाबा के साथ बैलगाड़ी पर चढ़कर खेतों में जाया करता था...:)
Sunday, April 25, 2010
वाह रे 'सानिया भाभीÓ
बात बीते हफ्ते की है। शोएब मलिक केकिसी दोस्त ने पाकिस्तान से सानिया मिर्जा को फोन किया और पूछ लिया...भाभी कैसी हो...। बस सानिया के जेहन में शायद सिरहन दौड़ गई। उन्होंने इस बात को मीडिया से शेयर किया कि किसी ने उनको भाभी कहा है। यह सुनना उनके लिए बड़ा अजीब था क्योंकि वह हमेशा सानिया...सानिया सुनने की आदी थी। इस बात को मीडिया भी ले उड़ा...और लगा दी पेज वन पर एंकर टाइप की खबर...'सानिया नहीं, सानिया भाभीÓ। लोगों ने खूब चटकारे ले ले कर खबरें पढ़ी।
अब चूंकि ये सानिया थी और इनको पड़ोसी मुल्क के किसी अपने ने भाभी कहा था सो खबर बननी भी थी। पता नहीं इसमें किसी को हैरत हुई या नहीं लेकिन मुझे इस पर उतनी ही हैरत हुई जितनी शायद सानिया को हुई होगी। होनी भी लाजिमी थी। क्योंकि हमारे यहां बेटियों की परवरिश उस अंदाज में की जाती है कि कभी उनको कोई भाभी, चाची, आंटी या फिर मामी पुकारेगा तो उनको झटका न लगे। कोई बड़े कुनबे वाला छोटा सा बच्चा दादी भी कह सकता है, लेकिन ये सब सुनने में बहुत अजीब नहीं लगता। अब चूंकि सानिया, सानिया मिर्जा हैं...इसलिए उनको ये शब्द बड़ा अटपटा लगा।
मुझे एक वाकिया याद है। मेरे एक रिश्तेदार हैं। प्रदेश की बड़ी शख्सियत हैं और लखनऊ में रहते हैं। उनकी बहन की शादी हुई। शादी के बाद जब वह पहली बार बहन के घर गए तो उनके आने की सूचना किसी ने ऐसे दी...भाभी...देखो नरेश भैया आए हैं। बस नरेश भैया का माथा ठनक गया...खैर रुककर जब वापस घर आए तो अपनी मां से बोले...महतारी जानेउ...ब्ट्यिावा केर घरइ गोमती नगर गएन रहैं...बिट्यावा केर देउर भाभी कहिके बुलाइस...हमार तबहीं माथा ठनक गवा...कि सार हमरी बहन का कौनो अइसउ बुलाई सकत है। खैर उनकी मां ने बताया कि बेटा ऐसा तुमको लगा है लेकिन बेटी को नहीं लगता है। क्योंकि उसको हमेशा से पता था कि एक दिन कोई उसको ऐसे पुकारेगा ही।
अंत में यही कहूंगा कि सानिया सानिया हैं। इसलिए उनको इसका कभी अहसास नहीं हुआ होगा कि कभी उनकी भी रिश्ते की डोर बंधेगी। कोई उनको भी किसी रिश्ते के नाम से पुकारेगा...भाभी...फुफ्फी...खाला...अम्मी...
अब चूंकि ये सानिया थी और इनको पड़ोसी मुल्क के किसी अपने ने भाभी कहा था सो खबर बननी भी थी। पता नहीं इसमें किसी को हैरत हुई या नहीं लेकिन मुझे इस पर उतनी ही हैरत हुई जितनी शायद सानिया को हुई होगी। होनी भी लाजिमी थी। क्योंकि हमारे यहां बेटियों की परवरिश उस अंदाज में की जाती है कि कभी उनको कोई भाभी, चाची, आंटी या फिर मामी पुकारेगा तो उनको झटका न लगे। कोई बड़े कुनबे वाला छोटा सा बच्चा दादी भी कह सकता है, लेकिन ये सब सुनने में बहुत अजीब नहीं लगता। अब चूंकि सानिया, सानिया मिर्जा हैं...इसलिए उनको ये शब्द बड़ा अटपटा लगा।
मुझे एक वाकिया याद है। मेरे एक रिश्तेदार हैं। प्रदेश की बड़ी शख्सियत हैं और लखनऊ में रहते हैं। उनकी बहन की शादी हुई। शादी के बाद जब वह पहली बार बहन के घर गए तो उनके आने की सूचना किसी ने ऐसे दी...भाभी...देखो नरेश भैया आए हैं। बस नरेश भैया का माथा ठनक गया...खैर रुककर जब वापस घर आए तो अपनी मां से बोले...महतारी जानेउ...ब्ट्यिावा केर घरइ गोमती नगर गएन रहैं...बिट्यावा केर देउर भाभी कहिके बुलाइस...हमार तबहीं माथा ठनक गवा...कि सार हमरी बहन का कौनो अइसउ बुलाई सकत है। खैर उनकी मां ने बताया कि बेटा ऐसा तुमको लगा है लेकिन बेटी को नहीं लगता है। क्योंकि उसको हमेशा से पता था कि एक दिन कोई उसको ऐसे पुकारेगा ही।
अंत में यही कहूंगा कि सानिया सानिया हैं। इसलिए उनको इसका कभी अहसास नहीं हुआ होगा कि कभी उनकी भी रिश्ते की डोर बंधेगी। कोई उनको भी किसी रिश्ते के नाम से पुकारेगा...भाभी...फुफ्फी...खाला...अम्मी...
Sunday, April 11, 2010
चचुआ
मैं रोजना की तरह शाम को दफ्तर में था। तभी हमारे मोबाइल फोन पर म्यूजिक बजने लगा। उठाकर देखा तो तो शहर से चचुआ का फोन था। चचुआ रिटायर्ड 'मास्साबÓ हैं। हैं तो बड़े भले आदमी लेकिन मीन-मेख खूब निकालते हैं। मसलन अगर आप उनसे कहो कि चचुआ ये आपकी पैंट शर्ट बहुत अच्छी सिली है। कहां से सिलवाई। फौरन जबाव देते हैं...क्या खाक अच्छी सिली है। देखो तो...ससुरे ने पैंट में सामने दो दो प्लेटें बना दी हैं। कतई लौंडा बना दिया है मुझे टेलर मास्टर ने। जब तक हम कुछ कहते कहते तब तक दो चार गाली दे मारी टेलर मास्टर को। बेचारा टेलर भी...। अच्छा...चचुआ तुनक मिजाज हैं इसलिए उनको मोहल्ले के लौंडे छेड़ते भी बहुत हैं। चचुआ जब कभी बालों में खिजाब लगा के निकलते हैं तो पूछो मत...कम बालों वाली मूछों पर धर धर ताव देते हैं...बालों में कंघी भी करते हैं...फिर इतना देख मोहल्ले के लौंडे कहीं रुकने वाले...कह ही देते चचुआ...मिथुन चक्रवर्ती लग रहे हो...और इतना कह कर लड़के भाग जाते...बस चचुआ को मिल गया मौका गरियाने का...ये...ये...रम गुलमवा का लौंडा...रुक...रुक और राम गुलाम के लड़के को दौड़ा लेते थे। तब मैं भी छोटा था...बदमाशी करने में पीछे कतई नहीं रहता था। चचुआ को भी छेड़ देता था लेकिन गुपचुप तरीकेसे। एक बार तो किसी की शादी में चचुआ की नाक में किसी ने जलेबी घुसेड़ दी। बस फिर क्या था छींकते छींकते चचुआ की हालत खराब...जब छींकने से फुरसत मिली तो लगे गरियाने...तेरी...। शादी में माहौल गरम हो गया। होना भी था...भई जिसकी नाक में जलेबी डालोगे तो वह भड़केगा ही...खैर...चचुआ की कहांनियां तो बहुत हैं। सुनाऊंगा तो पूरी किताब बन जाएगी। खैर, चचुआ का मैने फोन उठाया...दुआ सलाम हुई...फिर कहने लगे कि बेटा...अब मैं कब आऊं डॉक्टर को दिखाने...चार महीने बाद आने को कहा था...चार महीने होने को हैं...क्या टिकट करवा लूं। मैंने हां में जबाव दिया और फोन कट गया। कुछ देर तक मैं चुपचाप रहा फिर ऑफिस से बाहर निकल आया...सोचने लगा कि ये वहीं चचुआ हैं जो कभी बहुत तुनक मिजाज हुआ करते थे। बात बात पर गरियाते रहते थे। आज...बोलने में उनकी आवाज लडख़ड़ाती है। चलने के लिए किसी का सहारा लेना पड़ता है। बाल सफेद हैं लेकिन उनमे खिजाब नहीं है। बीमारी ने उनको तोड़कर रख दिया है। घर से बाहर निकलना भी अब उनकेलिए मुश्किल है...। आज उनको परेशान करने वाले मोहल्ले के लौंडे देश से लेकर विदेश में अच्छी अच्छी जगहों पर हैं। जिसको भी पता चलता है...वह चचुआ के इलाज के लिए हर संभव मदद करता है। करे भी क्यों न...चचुआ गरियाते थे...लेकिन प्यार भी करते थे...मैं भी उसी मदद करने वालों की कड़ी का एक हिस्सा बन उनका इलाज कराने का छोटा सा प्रयत्न करता हूं। उनका पीजीआई से इलाज चल रहा है। मेरे अच्छे डॉक्टर मित्र हैं जो चचुआ को अपना चचुआ समझ कर इलाज करते हैं।
Sunday, April 4, 2010
लद्दाख की ताशी
ताशी नाम था उसका। उम्र यही कोई दस बारह साल की रही होगी। लद्दाख के कोई बड़ी दूर दराज इलाके से चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज कराने के लिए पहुंची थी। घरवालों का साथ नहीं था सो इलाके के किसी लामा ने व्यवस्था की थी उसका इलाज कराने की। उसको ब्लड कैंसर था।
मुझे एक दिन पीजीआई के पुअर पेशेंट सेल से फोन आया कि एक ऐसी लड़की है जिसको मदद की जरूरत है। अगर अखबार में उसकी मदद के बारें कुछ भी आ जाएगा तो शायद उसका इलाज हो सकेगा। फोन सुनने के बाद मैं ताशी से मिलने पहुंचा। उसके साथ दो अन्य लड़कियां उसी के क्षेत्र से आई थी। पद्मा और शीइंग नाम था उनका। मैंने ताशी और उसके साथ आई दोनों लड़कियों से बात की। अगले दिन अखबार में मदद की खबर प्रकाशित की तो शहर के एक एनजीओ ने आगे बढ़ते हुए ताशी का इलाज ताउम्र कराने का वायदा कर दिया। उसका इलाज शुरू हो गया। मैं भी आते जाते उससे कभी कभार मिल लेता था। उसके चेहरे पर बहुत ही मासूमियत थी। जब भी मैं उससे मिलता तो वह हमेशा मुझसे पूछती कि भैया...मैंं ठीक हो जाऊंगी न...मैं भी उसको पूरे विश्वास के दिलासा दिलाता था कि हां...तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी। इतना सुनने के बाद वह मुस्कुरा देती थी। फिर कहती थी कि जब मैं ठीक हो जाऊं तो आप मेंरे गांव आना। वहां मैं आपको गाना सुनाऊंगी। फिर वह पता नहीं लद्दाखी भाषा में कोई लोकगीत गुनगुनाने लगती। करीब दो महीने तक दाखिल रहने के बाद डॉक्टरों ने उसको घर भेज दिया।
उसको गए हुए करीब छह सात महीने हो गए थे। उसकी कोई खोज खबर नहीं थी। तभी मैंने उस एनजीओ को फोन करके ताशी का हाल लेने के उसका कोई कांटेक्ट नंबर मांगा। नंबर लेने के दो-तीन दिन बाद मैंने जब फोन कर ताशी का हाल लिया तो पता चला कि...वह अब इस दुनिया में नहीं रही। फोन करने वाले शख्स को जब मैंने अपना परिचय दिया तो उसने बस इतना ही कहा...आप मुझे बाद में फोन करना ...मैं ताशी के अंतिम संस्कार में ही खड़ा हूं।
मैं स्तब्ध रह गया...सोचने लगा कि...वही ताशी...जिसने ठीक होने के बाद न जाने क्या क्या सपने देखे थे...आज लद्दाख के किसी इलाके में उसके सपने दफन हो रहे हैं...उसे गाना गाना अच्छा लगता था...आज के बाद उसकी आवाज उन बर्फीले इलाकों में कभी नहीं गूजेंगी...उसकी छोटी छोटी आंखों के हजारों सपने बिखर गए होंगे...मन में बार बार यही आ रहा था कि पता नहीं उसको हमारी याद होगी भी या नहीं...लेकिन न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि एक अंजान रिश्ता आज हमेशा हमेशा के लिए टूट गया...
मुझे एक दिन पीजीआई के पुअर पेशेंट सेल से फोन आया कि एक ऐसी लड़की है जिसको मदद की जरूरत है। अगर अखबार में उसकी मदद के बारें कुछ भी आ जाएगा तो शायद उसका इलाज हो सकेगा। फोन सुनने के बाद मैं ताशी से मिलने पहुंचा। उसके साथ दो अन्य लड़कियां उसी के क्षेत्र से आई थी। पद्मा और शीइंग नाम था उनका। मैंने ताशी और उसके साथ आई दोनों लड़कियों से बात की। अगले दिन अखबार में मदद की खबर प्रकाशित की तो शहर के एक एनजीओ ने आगे बढ़ते हुए ताशी का इलाज ताउम्र कराने का वायदा कर दिया। उसका इलाज शुरू हो गया। मैं भी आते जाते उससे कभी कभार मिल लेता था। उसके चेहरे पर बहुत ही मासूमियत थी। जब भी मैं उससे मिलता तो वह हमेशा मुझसे पूछती कि भैया...मैंं ठीक हो जाऊंगी न...मैं भी उसको पूरे विश्वास के दिलासा दिलाता था कि हां...तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी। इतना सुनने के बाद वह मुस्कुरा देती थी। फिर कहती थी कि जब मैं ठीक हो जाऊं तो आप मेंरे गांव आना। वहां मैं आपको गाना सुनाऊंगी। फिर वह पता नहीं लद्दाखी भाषा में कोई लोकगीत गुनगुनाने लगती। करीब दो महीने तक दाखिल रहने के बाद डॉक्टरों ने उसको घर भेज दिया।
उसको गए हुए करीब छह सात महीने हो गए थे। उसकी कोई खोज खबर नहीं थी। तभी मैंने उस एनजीओ को फोन करके ताशी का हाल लेने के उसका कोई कांटेक्ट नंबर मांगा। नंबर लेने के दो-तीन दिन बाद मैंने जब फोन कर ताशी का हाल लिया तो पता चला कि...वह अब इस दुनिया में नहीं रही। फोन करने वाले शख्स को जब मैंने अपना परिचय दिया तो उसने बस इतना ही कहा...आप मुझे बाद में फोन करना ...मैं ताशी के अंतिम संस्कार में ही खड़ा हूं।
मैं स्तब्ध रह गया...सोचने लगा कि...वही ताशी...जिसने ठीक होने के बाद न जाने क्या क्या सपने देखे थे...आज लद्दाख के किसी इलाके में उसके सपने दफन हो रहे हैं...उसे गाना गाना अच्छा लगता था...आज के बाद उसकी आवाज उन बर्फीले इलाकों में कभी नहीं गूजेंगी...उसकी छोटी छोटी आंखों के हजारों सपने बिखर गए होंगे...मन में बार बार यही आ रहा था कि पता नहीं उसको हमारी याद होगी भी या नहीं...लेकिन न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि एक अंजान रिश्ता आज हमेशा हमेशा के लिए टूट गया...
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