ताशी नाम था उसका। उम्र यही कोई दस बारह साल की रही होगी। लद्दाख के कोई बड़ी दूर दराज इलाके से चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज कराने के लिए पहुंची थी। घरवालों का साथ नहीं था सो इलाके के किसी लामा ने व्यवस्था की थी उसका इलाज कराने की। उसको ब्लड कैंसर था।
मुझे एक दिन पीजीआई के पुअर पेशेंट सेल से फोन आया कि एक ऐसी लड़की है जिसको मदद की जरूरत है। अगर अखबार में उसकी मदद के बारें कुछ भी आ जाएगा तो शायद उसका इलाज हो सकेगा। फोन सुनने के बाद मैं ताशी से मिलने पहुंचा। उसके साथ दो अन्य लड़कियां उसी के क्षेत्र से आई थी। पद्मा और शीइंग नाम था उनका। मैंने ताशी और उसके साथ आई दोनों लड़कियों से बात की। अगले दिन अखबार में मदद की खबर प्रकाशित की तो शहर के एक एनजीओ ने आगे बढ़ते हुए ताशी का इलाज ताउम्र कराने का वायदा कर दिया। उसका इलाज शुरू हो गया। मैं भी आते जाते उससे कभी कभार मिल लेता था। उसके चेहरे पर बहुत ही मासूमियत थी। जब भी मैं उससे मिलता तो वह हमेशा मुझसे पूछती कि भैया...मैंं ठीक हो जाऊंगी न...मैं भी उसको पूरे विश्वास के दिलासा दिलाता था कि हां...तू बिल्कुल ठीक हो जाएगी। इतना सुनने के बाद वह मुस्कुरा देती थी। फिर कहती थी कि जब मैं ठीक हो जाऊं तो आप मेंरे गांव आना। वहां मैं आपको गाना सुनाऊंगी। फिर वह पता नहीं लद्दाखी भाषा में कोई लोकगीत गुनगुनाने लगती। करीब दो महीने तक दाखिल रहने के बाद डॉक्टरों ने उसको घर भेज दिया।
उसको गए हुए करीब छह सात महीने हो गए थे। उसकी कोई खोज खबर नहीं थी। तभी मैंने उस एनजीओ को फोन करके ताशी का हाल लेने के उसका कोई कांटेक्ट नंबर मांगा। नंबर लेने के दो-तीन दिन बाद मैंने जब फोन कर ताशी का हाल लिया तो पता चला कि...वह अब इस दुनिया में नहीं रही। फोन करने वाले शख्स को जब मैंने अपना परिचय दिया तो उसने बस इतना ही कहा...आप मुझे बाद में फोन करना ...मैं ताशी के अंतिम संस्कार में ही खड़ा हूं।
मैं स्तब्ध रह गया...सोचने लगा कि...वही ताशी...जिसने ठीक होने के बाद न जाने क्या क्या सपने देखे थे...आज लद्दाख के किसी इलाके में उसके सपने दफन हो रहे हैं...उसे गाना गाना अच्छा लगता था...आज के बाद उसकी आवाज उन बर्फीले इलाकों में कभी नहीं गूजेंगी...उसकी छोटी छोटी आंखों के हजारों सपने बिखर गए होंगे...मन में बार बार यही आ रहा था कि पता नहीं उसको हमारी याद होगी भी या नहीं...लेकिन न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि एक अंजान रिश्ता आज हमेशा हमेशा के लिए टूट गया...
Sunday, April 4, 2010
Tuesday, February 23, 2010
...वो कैंटीन की स्टोरी
दीवाली से कुछ रोज पहले की ही बात है। हमेशा की भांति मार्निंग मीटिंग में पहुंचा और अपनी ओर से एक धांसू सा स्टोरी आइडिया फेंका। चूंकि उन दिनों शहर के बेहतरीन होटलों में बनने वाले फूड आइटम की असलियत खोलने की 'पड़तालÓ नामक सीरीज सुपर हिट हुई थी। प्रशासन ने हर एक खबर को संज्ञान में लेते हुए त्वरित कार्रवाईयां भी की थी। इसलिए मनोबल भी खूब बढ़ा हुआ था। मीटिंग में बॉस ने उसी सीरीज की एक और कड़ी के तौर पर स्टोरी को बेहतर ढंग से कवर करने को कहा। सो जुट गया उस स्टोरी की तह तक जाने में।
दरअसल ये स्टोरी थी उस कैंटीन मालिक तथा प्रशासन की मिलीभगत की जो कि अस्पताल के नाम पर कैंटीन खोलने के बाद उसको किसी दूसरे परपज के लिए चलाने लगा था। कैंटीन मालिक ने अस्पताल परिसर की बजाए शहर की सबसे भीड़ भाड़ वाली प्रमुख मार्केट की ओर अपनी कैंटीन कम रेस्टोरेंट को शिफ्ट कर दिया। कहानी का जिष्टï था कि जिनके लिए ये सुविधा शुरू की गई वह अभी भी उससे वंचित हैं और उक्त कैंटीन मालिक मरीजों के नाम पर सब्सिडी पाकर अपना धंधा चमका रहा है।
इस मामले की पूरी खबर मैंने अखबार में प्रमुखता से प्रकाशित की। खबर छपते ही प्रशासन पुन: हरकत में आ गया। स्वास्थ्य विभाग ने आनन फानन में उस कैंटीन के आवंटन के कागजात चेक किए और पाया कि जो कुछ अखबार में छपा है वह सही है। इसलिए विभाग ने ततकाल ही उस कैंटीन का ठेका निरस्त कर उसको ब्लैकलिस्ट कर दिया। इसी केसाथ वह कैंटीन बंद हो गई। एक बार फिर से खबर के तात्कालिक असर पर पर बधाईयां मिली।
खैर, फिर वहीं रूटीन शुरू हो गया। रोज की भांति वहीं मीटिंग, वहीं स्टोरी आइडिया और दिन भर काम करके शाम को खबरों का फाइल करना। खबर छपने के तीन दिन बाद अचानक मीटिंग के बाद मेरे पास बॉस जो कि हमारे सिटी इंचार्ज थे, उनका फोन आया। (मैं जिन बॉस की बात कर रहा हूं वह इस वक्त उत्तर प्रदेश की एक बड़ी यूनिट के संपादक हैं) उन्होंने जो कुछ भी बताया वह मुझे सिर्फ और सिर्फ स्तब्ध करने वाली खबर थी। उन्होंने बताया कि बेटा...जो हमने कैंटीन वाली स्टोरी की थी उसका आज मालिक आया था। अपने दोनों बेटों के कंधो का सहारा लेकर। उसको इस खबर के बाद लकवा मार गया। उसका बांया अंग पैरालाइज हो चुका है। बॉस ने बताया कि वह जो कुछ बोल रहा था उससे इतना ही समझ में आ रहा था कि...अब मेरे बच्चों का क्या होगा। उसकी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे...।
इतना सुनते ही मेरे दिमाग में सिर्फ उसी व्यक्ति की तस्वीर घूमने लगी। जो उस स्टोरी को करने के दौरान वहीं व्यक्ति अपनी कैंटीन की फोटो न करने देने के लिए मेरी बाइक के सामने आ गया था। मेरे फोटोजर्नलिस्ट से कैमरा छींनने लगा था। ऊंची ऊंची आवाज में लडऩे लगा था...आज वहीं...। इतना सुनकर मेरे मुंह से अनायास फोन पर यही निकला कि...सर...अब मैं पत्रकारिता नहीं करूंगा...छोंड़ दूंगा ये प्रोफेशन...वापस अपने घर चला जाऊंगा, लेकिन अब ऐसा प्रोफेशन नहीं करूंगा। मैं ये बात अपने बॉस से कह रहा था लेकिन वह ये बात किसी से कह नहीं सकते थे। क्योंकि वहीं सब कुछ उनकेजेहन में भी चल रहा था। वह मुझसे ज्यादा परेशान थे। उन्होंने कहा भी कि स्टोरी तो तुमने की है लेकिन करवाई तो मैंने ही हैं...शाम को आफिस पहुंचा...काम में तो जी लग नहीं रहा था। मेरे दिमाग में बार बार यही आ रहा था कि कुछ दिनों बाद दीवाली है। क्या आलम होगा उस घर में। सोच सोच कर कम्प्यूटर से उठ कर बाहर आ जाता था...।
सो अगले दिन जो मैंने किया मुझे नहीं मालूम कितना सही था कितना गलत। मैंने स्वास्थ्य सचिव से कहकर उस कैंटीन के रद्द हुए लाइसेंस को दोबारा मान्यता दिलवाई। उसकी फर्म को ब्लैकलिस्ट से बाहर करवाया। मुझे नहीं पता था कि ये वैध था या अवैध लेकिन उसको बगैर टेंडर के दोबारा उसी हॉस्पिटल का ठेका एक साल की बजाए तीन साल का दिलवाया। प्रशासन ने लचीला रुख अख्तियार करते हुए कैंटीन कहीं भी चलाने की लिखित अनुमति दे दी...। पश्चाताप के लिए मैंने ये सब करने की अनुमति अपने बॉस से ले ली थी। लेकिन मुझे और मेरे बॉस को आज भी इस बात का अहसास है कि जो हुआ वह बहुत गलत था...उसका प्रायश्चित कभी नहीं हो सकेगा...लेकिन सुनने में आया था कि अब वह कैंटीन मालिक स्वस्थ है तो कुछ राहत मिली।
आज भी जब मैं कोई स्टोरी करने जाता हूं तो इस बात का पूरा ख्याल रखता हूं कि कहीं कोई हमारी कहानी के चक्कर में ऐसा व्यक्ति न आ जाए जो कि अपनी थोड़ी सी गलती के लिए इतनी बड़ी सजा भुगतने लगे...
दरअसल ये स्टोरी थी उस कैंटीन मालिक तथा प्रशासन की मिलीभगत की जो कि अस्पताल के नाम पर कैंटीन खोलने के बाद उसको किसी दूसरे परपज के लिए चलाने लगा था। कैंटीन मालिक ने अस्पताल परिसर की बजाए शहर की सबसे भीड़ भाड़ वाली प्रमुख मार्केट की ओर अपनी कैंटीन कम रेस्टोरेंट को शिफ्ट कर दिया। कहानी का जिष्टï था कि जिनके लिए ये सुविधा शुरू की गई वह अभी भी उससे वंचित हैं और उक्त कैंटीन मालिक मरीजों के नाम पर सब्सिडी पाकर अपना धंधा चमका रहा है।
इस मामले की पूरी खबर मैंने अखबार में प्रमुखता से प्रकाशित की। खबर छपते ही प्रशासन पुन: हरकत में आ गया। स्वास्थ्य विभाग ने आनन फानन में उस कैंटीन के आवंटन के कागजात चेक किए और पाया कि जो कुछ अखबार में छपा है वह सही है। इसलिए विभाग ने ततकाल ही उस कैंटीन का ठेका निरस्त कर उसको ब्लैकलिस्ट कर दिया। इसी केसाथ वह कैंटीन बंद हो गई। एक बार फिर से खबर के तात्कालिक असर पर पर बधाईयां मिली।
खैर, फिर वहीं रूटीन शुरू हो गया। रोज की भांति वहीं मीटिंग, वहीं स्टोरी आइडिया और दिन भर काम करके शाम को खबरों का फाइल करना। खबर छपने के तीन दिन बाद अचानक मीटिंग के बाद मेरे पास बॉस जो कि हमारे सिटी इंचार्ज थे, उनका फोन आया। (मैं जिन बॉस की बात कर रहा हूं वह इस वक्त उत्तर प्रदेश की एक बड़ी यूनिट के संपादक हैं) उन्होंने जो कुछ भी बताया वह मुझे सिर्फ और सिर्फ स्तब्ध करने वाली खबर थी। उन्होंने बताया कि बेटा...जो हमने कैंटीन वाली स्टोरी की थी उसका आज मालिक आया था। अपने दोनों बेटों के कंधो का सहारा लेकर। उसको इस खबर के बाद लकवा मार गया। उसका बांया अंग पैरालाइज हो चुका है। बॉस ने बताया कि वह जो कुछ बोल रहा था उससे इतना ही समझ में आ रहा था कि...अब मेरे बच्चों का क्या होगा। उसकी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे...।
इतना सुनते ही मेरे दिमाग में सिर्फ उसी व्यक्ति की तस्वीर घूमने लगी। जो उस स्टोरी को करने के दौरान वहीं व्यक्ति अपनी कैंटीन की फोटो न करने देने के लिए मेरी बाइक के सामने आ गया था। मेरे फोटोजर्नलिस्ट से कैमरा छींनने लगा था। ऊंची ऊंची आवाज में लडऩे लगा था...आज वहीं...। इतना सुनकर मेरे मुंह से अनायास फोन पर यही निकला कि...सर...अब मैं पत्रकारिता नहीं करूंगा...छोंड़ दूंगा ये प्रोफेशन...वापस अपने घर चला जाऊंगा, लेकिन अब ऐसा प्रोफेशन नहीं करूंगा। मैं ये बात अपने बॉस से कह रहा था लेकिन वह ये बात किसी से कह नहीं सकते थे। क्योंकि वहीं सब कुछ उनकेजेहन में भी चल रहा था। वह मुझसे ज्यादा परेशान थे। उन्होंने कहा भी कि स्टोरी तो तुमने की है लेकिन करवाई तो मैंने ही हैं...शाम को आफिस पहुंचा...काम में तो जी लग नहीं रहा था। मेरे दिमाग में बार बार यही आ रहा था कि कुछ दिनों बाद दीवाली है। क्या आलम होगा उस घर में। सोच सोच कर कम्प्यूटर से उठ कर बाहर आ जाता था...।
सो अगले दिन जो मैंने किया मुझे नहीं मालूम कितना सही था कितना गलत। मैंने स्वास्थ्य सचिव से कहकर उस कैंटीन के रद्द हुए लाइसेंस को दोबारा मान्यता दिलवाई। उसकी फर्म को ब्लैकलिस्ट से बाहर करवाया। मुझे नहीं पता था कि ये वैध था या अवैध लेकिन उसको बगैर टेंडर के दोबारा उसी हॉस्पिटल का ठेका एक साल की बजाए तीन साल का दिलवाया। प्रशासन ने लचीला रुख अख्तियार करते हुए कैंटीन कहीं भी चलाने की लिखित अनुमति दे दी...। पश्चाताप के लिए मैंने ये सब करने की अनुमति अपने बॉस से ले ली थी। लेकिन मुझे और मेरे बॉस को आज भी इस बात का अहसास है कि जो हुआ वह बहुत गलत था...उसका प्रायश्चित कभी नहीं हो सकेगा...लेकिन सुनने में आया था कि अब वह कैंटीन मालिक स्वस्थ है तो कुछ राहत मिली।
आज भी जब मैं कोई स्टोरी करने जाता हूं तो इस बात का पूरा ख्याल रखता हूं कि कहीं कोई हमारी कहानी के चक्कर में ऐसा व्यक्ति न आ जाए जो कि अपनी थोड़ी सी गलती के लिए इतनी बड़ी सजा भुगतने लगे...
Sunday, February 21, 2010
इमली के पेड़ पर यादों क झुरमुट
वह इमली का पेड़ आज भी है। जिसने मुझे अपने बाबा की उंगली पकड़ कर लडख़ड़ाते हुए खेतों में जाते हुए देखा था। मुझे आज भी कुछ कुछ याद आ रहा है कि जब मेरे बाबा खेतों में खाद डालने जाते थे तो मैं भी उनके साथ बैलगाड़ी पर पीछे से चढ़ जाता था। बैलों को हांकना नहीं आता था लेकिन उनके साथ कोशिश किया करता था। बाबा खेतों में खाद डालते थे और मैं चुपचाप उतर कर उसी इमली के पेड़ के नीचे बैठकर उसकी पत्तियों को खाता था। बड़ी खट्टïी पत्तियां होती थी सो ढेर सारी रख लेता था। जो कि घर पर वापस आकर भी खाता था। कभी कभार इसके लिए डांट भी पड़ती थी लेकिन...।
समय बीतता गया और सब कुछ बदलता रहा। मैं गांव से अपने पिता जी के पास शहर पहुंच गया। लेकिन हर छुट्टïी पर मैं पिता जी के साथ जिद करके साइकिल पर गांव जरूर जाता था। गांव जाता तो फिर उनके साथ खेतों पर भी जाता था। उसी इमली के पेड़ की पत्तियां खाता और अगर इमलियां लगी होती तो पिता जी से जिदकर के दो चार तुड़वा लेता था। धीरे धीरे पढ़ाई के दौरान स्कूल की ऊपरी कक्षाओं में पहुुंच गया तो गांव भी जाना कुछ कम हो गया। पिता जी पहले सरकारी अध्यापक थे लेकिन बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू कर लिया। लेकिन मैंने जबसे होश संभाला तब से मैंने पिता जी को व्यवसाय करते ही देखा है जो कि आज भी अनवरत जारी है।
शायद समय और जरूरी सुख सुविधाओ के अभाव के कारण मेरे बाबा और दादी अम्मा को भी पिता जी ने गांव से शहर में बुला लिया। वैसे मेरे बाबा, दादी अम्मा और पिताजी तो गांव जाया करते थे लेकिन मैं किसी कार्यक्रम में ही ले जाया जाता था। प्रमुख कारण सिर्फ स्कूल होता था। बैलगाड़ी...साइकिल...और अब स्कूटर। मेरे पिता जी के पास प्रिया स्कूटर था। मैं कुछ बड़ा हुआ था सो उनको पीछे बिठाकर चलाने लगा था। जब गांव जाता तो हमेशा की भांति उन्हीं खेतों की ओर जाता था जहां पर कभी बाबा के साथ बैलगाड़ी पर जाया करता था। उसी पेड़ के नीचे अब मै स्कूटर लगाता था और आराम से खेतों से वापस आ जाता था। स्कूटर से मोटरसाइकिल आई। तब तक मैं भी जवान हो गया था।
कुछ साल पहले मैं अपने गांव एक लंबे समय बाद शायद आठ नौ साल बाद गया। इस बार मैं कार पर था। मैंने कार को उस जगह पर लगाया जहां पर एक दीमक लगा पेड़ था। पेड़ पूरी तरह से सूख चुका था। छांव के लिए उसकी पत्तियां भी नहीं थी। कुछ बच्चों ने उसकी जड़ के पास एक दो गाय बांध रखी थी। पूरा खेत घूम आया। पिता जी भी थे। वापस आते हुए मैंने उनसे पूछ लिया...पिता जी यहां पर एक इमली का पेड़ हुआ करता था। उन्होंने इशारा करते हुए कहा कि यही तो है सामने...जहां कार खड़ी की है। मैंने उसकी ओर देखा...एकबारबी उस निर्जीव पेड़ के लिए आंखे आंखे भर आईं। मन में वह सालों पहले के दृश्य हल्के हल्के से सजीव हो उठे। जब इसी पेड़ की छांव में मैं बैठकर पत्तियां खाता था। बाबा के साथ। अब न तो बाबा है और न वह बैलगाड़ी। एक इमली का पेड़ था वह भी अपने अस्तित्व के समापन की ओर है...।
समय बीतता गया और सब कुछ बदलता रहा। मैं गांव से अपने पिता जी के पास शहर पहुंच गया। लेकिन हर छुट्टïी पर मैं पिता जी के साथ जिद करके साइकिल पर गांव जरूर जाता था। गांव जाता तो फिर उनके साथ खेतों पर भी जाता था। उसी इमली के पेड़ की पत्तियां खाता और अगर इमलियां लगी होती तो पिता जी से जिदकर के दो चार तुड़वा लेता था। धीरे धीरे पढ़ाई के दौरान स्कूल की ऊपरी कक्षाओं में पहुुंच गया तो गांव भी जाना कुछ कम हो गया। पिता जी पहले सरकारी अध्यापक थे लेकिन बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू कर लिया। लेकिन मैंने जबसे होश संभाला तब से मैंने पिता जी को व्यवसाय करते ही देखा है जो कि आज भी अनवरत जारी है।
शायद समय और जरूरी सुख सुविधाओ के अभाव के कारण मेरे बाबा और दादी अम्मा को भी पिता जी ने गांव से शहर में बुला लिया। वैसे मेरे बाबा, दादी अम्मा और पिताजी तो गांव जाया करते थे लेकिन मैं किसी कार्यक्रम में ही ले जाया जाता था। प्रमुख कारण सिर्फ स्कूल होता था। बैलगाड़ी...साइकिल...और अब स्कूटर। मेरे पिता जी के पास प्रिया स्कूटर था। मैं कुछ बड़ा हुआ था सो उनको पीछे बिठाकर चलाने लगा था। जब गांव जाता तो हमेशा की भांति उन्हीं खेतों की ओर जाता था जहां पर कभी बाबा के साथ बैलगाड़ी पर जाया करता था। उसी पेड़ के नीचे अब मै स्कूटर लगाता था और आराम से खेतों से वापस आ जाता था। स्कूटर से मोटरसाइकिल आई। तब तक मैं भी जवान हो गया था।
कुछ साल पहले मैं अपने गांव एक लंबे समय बाद शायद आठ नौ साल बाद गया। इस बार मैं कार पर था। मैंने कार को उस जगह पर लगाया जहां पर एक दीमक लगा पेड़ था। पेड़ पूरी तरह से सूख चुका था। छांव के लिए उसकी पत्तियां भी नहीं थी। कुछ बच्चों ने उसकी जड़ के पास एक दो गाय बांध रखी थी। पूरा खेत घूम आया। पिता जी भी थे। वापस आते हुए मैंने उनसे पूछ लिया...पिता जी यहां पर एक इमली का पेड़ हुआ करता था। उन्होंने इशारा करते हुए कहा कि यही तो है सामने...जहां कार खड़ी की है। मैंने उसकी ओर देखा...एकबारबी उस निर्जीव पेड़ के लिए आंखे आंखे भर आईं। मन में वह सालों पहले के दृश्य हल्के हल्के से सजीव हो उठे। जब इसी पेड़ की छांव में मैं बैठकर पत्तियां खाता था। बाबा के साथ। अब न तो बाबा है और न वह बैलगाड़ी। एक इमली का पेड़ था वह भी अपने अस्तित्व के समापन की ओर है...।
हेलो दोस्तों
नमस्कार दोस्तों। एक लंबे अरसे बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। व्यस्तता के चलते कुछ लिख नहीं सका। इस दौरान मैंने व्यावसायिक होने का एक और प्रमाण दिया। एक बार और संस्थान बदल दिया। वापस उसी अखबार को ज्वाइन किया जहां से चंडीगढ़में शुरुआत की थी। सबकुछ पुराना सा ही लगा। क्योंकि बहुत से लोग अभी भी पुराने थे। इसलिए रमने में जरा भी वक्त नहीं लगा। उसी तरह से काम कर रहा हूूं। कभी स्कोर तो कभी मिसिंग...। जिंदगी...गोइंग आन...
Wednesday, October 14, 2009
हां...मैंने झेला है तालिबान का कहर
तालिबानी फरमान...मतलब कुछ ऐसा जो कि सबसे हटके हो। मसलन...महिलाएं ब्यूटी पार्लर न जाएं...मुस्लिम युवकों को दाढ़ी रखनी ही होगी...टेलीवीजन देखना अपराध है...और अगर खुदा न खास्ता कहीं सीडी या डीवीडी से कोई फिल्म या गाने आदि सुन लिए तो समझो कहर बरपा ही बरपा। इन सबको जिसने नहीं माना उसका सिर अगले दिन स्वात घाटी के उन तीस गांवों में से किसी एक गांव के चौराहे पर पड़ा मिलता था जहां के वह वाशिंदे होते थे।
खुदाबक्श और शाहिद...ये वो दो शख्स हैं जिन्होंने तालिबानी बर्बरता को बहुत नजदीक से देखा है। पिछले सोमवार को मैं इन दोनों युवकों से चंडीगढ़ में एक ट्रेड फेयर में मिला। दोनों फेयर में हिस्सा लेने आए थे। ये दोनों स्वात घाटी के मिंगौरा टाउन के रहने वाले हैं। मिंगौरा स्वात घाटी की सबसे ज्यादा चहल पहल वाली जगह है। खुदाबक्श बताता है कि हर सुबह मैं अपना एफम रेडियो शुरू कर देता था। किसी भी वक्त एक संदेश गूंजता था...और बस...सब की जान हलक में। लोग अपने घरों से नहीं निकलते थे। क्योंकि डर बना रहता था कि पता नहीं कब कौन किस चौराहे पर तालिबानी बर्बरता का शिकार बन जाए। इसी बीच शाहिद बोल पड़ता है...भाईजान तालिबान की सीआईडी बहुत तेज थी...उन लोगों को पता चल जाता था कि किसने उनके आदेशों का पालन नहीं किया है। बस समझो कि उसका काम तमाम हो जाता था। हम लोग कहीं जाते ही नहीं थे। घरों पर लगे डिश टीवी के एंटीने उतर गए थे। बस रेडियो पर ही समाचार सुनकर जानते थे कि कहर कितना बरप रहा है। पियूचार...ये वो गांव है स्वात घाटी का जो कि तालिबानियों का गढ़ है। दोनों युवकों के मुताबिक इसी गांव से तालिबानियों के समर्थन में सबसे ज्यादा आवाजें आती थी। पेशे से कपड़ों के व्यापारी दोनों भाईयों का कहना है कि एक दिन अल-सुबह पाकिस्तान की फौज की ओर से आदेश आया कि...सभी लोग तीन घंटों के अंदर अपने अपने घरों को छोड़ दो...किसी दूसरे शहर में जाकर आसरा लो। हम लोगों को तालिबानियों का सफाया करना है। सालों पुराने पुस्तैनी घरों को एकदम छोड़कर जाना...बहुत मुश्किल काम था। न जाने कितनी यादें जुड़ी हुई थी इन घरों से। ये कहना मुश्किल था कि जो घर हम छोड़कर जा रहे हैं वो तालिबानी सफाए के दौरान बचेंगे भी या नहीं...और भी न जाने क्या क्या। लेकिन जाना तो था ही। सो हम लोग अपनी अम्मी, अब्बू और भाई बहन के साथ पाकिस्तान के मरदान शहर आ गए। तीन महीने बाद...कहा गया कि आप लोग वापस अपने अपने घरों में जा सकते हो। वापस जाकर देखा तो सब कुछ सहीं सलामत था...बताया गया कि फजुल्लाह मारा गया...अब शायद अमन शांति हो सकेगी। दोनों भाई सोमवार यानीकि 12 अक्टूबर को ये बातचीत मेरे साथ कर रहे थे कि टीवी पर एक खबर फ्लैश होती है कि...फिर से तालिबान का पाकिस्तान में कहर, सेना ने की कार्रवाई...दोनों भाईयों ने ये सुनकर एक बार फिर से खुदा को याद किया...और दुआ की कि उनके घर में अब्बू, अम्मी और छोटी बहन की हिफाजत करना...इतना कह कर वह एक जाने पहचाने भय के साथ अपने काम में मन लगाने में व्यस्त्त होने की कोशिश करने लगे...ये सोचते हुए कि जल्दी से वापस अपने घर जाएं...अपनी घाटी में...अशांति ही सही लेकिन अपनों के बीच...।
खुदाबक्श और शाहिद...ये वो दो शख्स हैं जिन्होंने तालिबानी बर्बरता को बहुत नजदीक से देखा है। पिछले सोमवार को मैं इन दोनों युवकों से चंडीगढ़ में एक ट्रेड फेयर में मिला। दोनों फेयर में हिस्सा लेने आए थे। ये दोनों स्वात घाटी के मिंगौरा टाउन के रहने वाले हैं। मिंगौरा स्वात घाटी की सबसे ज्यादा चहल पहल वाली जगह है। खुदाबक्श बताता है कि हर सुबह मैं अपना एफम रेडियो शुरू कर देता था। किसी भी वक्त एक संदेश गूंजता था...और बस...सब की जान हलक में। लोग अपने घरों से नहीं निकलते थे। क्योंकि डर बना रहता था कि पता नहीं कब कौन किस चौराहे पर तालिबानी बर्बरता का शिकार बन जाए। इसी बीच शाहिद बोल पड़ता है...भाईजान तालिबान की सीआईडी बहुत तेज थी...उन लोगों को पता चल जाता था कि किसने उनके आदेशों का पालन नहीं किया है। बस समझो कि उसका काम तमाम हो जाता था। हम लोग कहीं जाते ही नहीं थे। घरों पर लगे डिश टीवी के एंटीने उतर गए थे। बस रेडियो पर ही समाचार सुनकर जानते थे कि कहर कितना बरप रहा है। पियूचार...ये वो गांव है स्वात घाटी का जो कि तालिबानियों का गढ़ है। दोनों युवकों के मुताबिक इसी गांव से तालिबानियों के समर्थन में सबसे ज्यादा आवाजें आती थी। पेशे से कपड़ों के व्यापारी दोनों भाईयों का कहना है कि एक दिन अल-सुबह पाकिस्तान की फौज की ओर से आदेश आया कि...सभी लोग तीन घंटों के अंदर अपने अपने घरों को छोड़ दो...किसी दूसरे शहर में जाकर आसरा लो। हम लोगों को तालिबानियों का सफाया करना है। सालों पुराने पुस्तैनी घरों को एकदम छोड़कर जाना...बहुत मुश्किल काम था। न जाने कितनी यादें जुड़ी हुई थी इन घरों से। ये कहना मुश्किल था कि जो घर हम छोड़कर जा रहे हैं वो तालिबानी सफाए के दौरान बचेंगे भी या नहीं...और भी न जाने क्या क्या। लेकिन जाना तो था ही। सो हम लोग अपनी अम्मी, अब्बू और भाई बहन के साथ पाकिस्तान के मरदान शहर आ गए। तीन महीने बाद...कहा गया कि आप लोग वापस अपने अपने घरों में जा सकते हो। वापस जाकर देखा तो सब कुछ सहीं सलामत था...बताया गया कि फजुल्लाह मारा गया...अब शायद अमन शांति हो सकेगी। दोनों भाई सोमवार यानीकि 12 अक्टूबर को ये बातचीत मेरे साथ कर रहे थे कि टीवी पर एक खबर फ्लैश होती है कि...फिर से तालिबान का पाकिस्तान में कहर, सेना ने की कार्रवाई...दोनों भाईयों ने ये सुनकर एक बार फिर से खुदा को याद किया...और दुआ की कि उनके घर में अब्बू, अम्मी और छोटी बहन की हिफाजत करना...इतना कह कर वह एक जाने पहचाने भय के साथ अपने काम में मन लगाने में व्यस्त्त होने की कोशिश करने लगे...ये सोचते हुए कि जल्दी से वापस अपने घर जाएं...अपनी घाटी में...अशांति ही सही लेकिन अपनों के बीच...।
Saturday, October 3, 2009
रात का सफर
रात का सफर शाम ढल रही थी। ठंड तो थी ही। लेेकिन सूरज पहाड़ों की गोद में पनाह लेने के बाद कुछ ज्यादा ही ठंड का अहसास कराने पर तुला था। रोशनी से धीरे धीरे दुकानें तो जगमगा ही रही थीं बल्कि दूर दराज की पहाडिय़ों पर भी रोशनी के जुगनू टिमटिमाने लगे थे। शिमला की माल रोड पर हम कुछ साथियों के साथ काफी हाऊस में बैठे कॉफी की चुस्कियां ले रहे थे।तभी पीछे से आवाज आती है...चलो भई...चलना नहीं है...सामान वामान पैक करना है। रात को अपनी बस है। हम लोग अब शिमला से मनाली के लिए जाने वाले थे।जैसे तैसे सर्द हो चुकी रात में हम लोग अपने होटल पहुंचे। वहां से सामान उठाया। जैकेट पहनने के साथ एक गर्म चादर साथ में रख ली। इसका अंदाजा बखूबी था कि ठंड की रात में सरकारी बस का सफर किसी भी तरह का हो सकता था मसलन ठिठुरन भरा। हुआ भी करीब-करीब वैसा ही। बस चली तो एक अजब ही जोश...लेकिन इस जोश को फुर्र होते ज्यादासमय न लगा। क्योंकि सरकारी बसों की एकाध खिड़कियों के पूरी तरह से बंद न होने केे कारण बर्फ सी चुभने वाली शीत लहर अंदर घुसने लगी थी। मैने तो तुरंत ही सीट छोड़कर बस के बीच मेंं बनी गैलरी में एक चादर बिछाई और गरम चादर को ओढ़ कर लेट गया। कब नींद आई पता नहीं लेकिन जब जगाया गया तो मनाली आ चुका था। उन साथियों ने मुझे लात मार कर जगाया जिनको बस में लेटनेे की जगह नहीं मिली थी। वैसे उन साथियों ने मुझे जगाने के बाद यही कहा कि तूने रात को हमलोगों की मस्तियों का दौर नहीं देखा। तूने बहुत कुछ मिस कर दिया। किसी नेबताया कि हम लोग तो रातभर अंताक्षरी खेलते आए तो किसी ने बताया कि में तो इसी जुगाड़ में लगा रहा कि अपनी गर्ल फ्रेंड के पास जाकर बैठ जाऊंतो कोई कुछ बताने में लग गया। लेकिन मुझे बाद में ये पता चला कि इन सभी मस्ती तो क्या ही की लेकिन मेरे जैसे तीन अन्य साथियों को खूब कोसा...साले...पहले ही लेट गए...अब बताओं हम कहां लेटे...ठंड के मारे जान निकली जा रही है। वैसे इनमें बहुत से ऐसे लोग भीथे जो कि लड़कियों के सामने गैलरी में लेटना अपनी शान केे खिलाफ समझते थे...लेकिन यकीन मानिए मुझे जहां तक पता चला तो इनकी ये शान रात भर में हवा हो गई थी।खैर, हम सभी मनाली के बस अड्डे पर खड़े थे। विश्वकर्मा सर ने कहा कि चाय वाय पी ली जाए फिर होटल की ओर चले। जब हम लोग मनली पहुचे तो सुबह के तकरीबन पांच बज रहे थे। सर्दी के मौसम में उस वक्त अंधेरा ही होता है। सफर यही कोई नौ से दस घंटे का था और चार लोगों को छोड़कर रात को कोई बस में सो भी नहीं पाया था। सो सब लोग होटल पहुंच कर सो गए। बचा मैं और मेरे तीन अन्य साथी। सब लोगों ने योजना बनाई कि चलो यहां की सुबह देखते हैं। हम चारो लोग पैदल ही निकल पड़े मनाली लेह मार्ग पर। ब्यास नहीं अपने मस्त आवेग से बह रही थी...हम लाग सड़क छेाड़ कर नदी के पास पहुंच गए...नदी के पीछे जंगल...और उसके पीछे दूर पहाड़ों पर जमी बर्फ....हम लोगों के कदम उस नजारे को कैद करने के लिए रुक गए..़़.सूरज भी निकलने को था...पूरब दिशा में हल्की हल्की पीली रोशनी लिए हुए धुंध छाई हुई थी...तभी कुछ देर में ही वो धुंध हटने लगी और सूरज की रोशनी से सफेद बर्फ से पहाड़ और ब्यास नदी की लहरें सुनहरे रंग सी दिखनें लगी..आसमान साफ हो गया...घड़ी की ओर नजर दौड़ाई तो पता चला कि सवा सात बज चुके हैं...हम लोगों ने वापस अपने होटल जाने की ओर चल पड़े...वहां पहुंच कर देखा तो सभी लोग अभी भी घोड़े बेचकर सो रहे थे...मैंने भी मौका नहीं गंवाया...उन साथियों को लात मार कर जगाया जिन्होंने मुझे बस में ऐसे जगाया था...।
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